ये क्यूबिकल भी कितने खुले होते हैं न .... भावनाओं जैसे ...
कहाँ से कौन सी बात अनचाहे ही कानों में पड़ जाए, पता ही नहीं चलता | यूं तो सबको क्यूब एटिकेट खूब सिखाया जाता है - दूसरों की बात नहीं सुनते, दूसरों की मेल नहीं पढ़ते |
पर हम भी तो इंसान हैं .. कैसे बच सकेंगे.. . हंसी से... दर्द से... आंसू से ... प्यार से .....
"तुषार ऐसे करो तुम मेरे क्यूब में आ जाओ , यहीं पर ये काम निपटा लेंगे और जल्दी हो जायेगा ....." कोमल ने अपने सह कर्मी को फोन पर समझाया |
हमारा ये फ्लोर लगभग खाली ही था | गिने चुने लोगों की सीट थी यहाँ पर, बाकी सारा फ्लोर जैसे खाली था | काम करने वाले भी ज्यादातर घर से ही काम करते थे | बुरा हो मेरे मेनेजर का जो मुझे आज तक घर से काम करने की अनुमति नहीं देता है |
"हाँ देखो इस को यहाँ से हटाना है ... और देखो इसकी वजह से यहाँ बग आ रहा है..." कुछ देर में ही तुषार और कोमल अपने काम में व्यस्त हो गए | मेरा भी ध्यान अपने स्क्रीन पर केन्द्रित हो गया |
रोज़ इन दोनों की बातों को सुन सुन मुझे बहुत अच्छा लगता था| इस नीरवता और सन्नाटे को चुनौती देता हुआ इन दोनों का अनर्गल प्रलाप मुझे जीवित रखता था | धीरे धीरे जैसे मुझे इन दोनों से बहुत अपनापन सा आने लगा था .....जैसे एक आदत सी पड़ गयी इनकी आवाजों की|
पर कभी ध्यान नहीं दिया की क्या कहते हैं , उनके काम की बातें हैं , मुझे क्या?
पर पिछले कुछ दिनों से इनकी बातें कुछ बदल सी रही थीं | धीरे धीरे कुछ कुछ हंसी सुनाई पड़ती, कभी कभी शायद काम के बीचों बीच कुछ अपनी बातें भी हो जाती थीं |
"तुषार तुम्हें पता है, आज न कैफेटेरिया में एक नयी चीज़ आई है , चलो लेकर आते हैं, साथ में वाक भी कर लेंगे |" कोमल ने कहा |
इनकी बातों से अप्रत्यक्ष रूप से मैं अपने जीवन को पुनः जी रही थी | एक प्यार भरी ज़िन्दगी |
पर शायद इन्हें अपने ही एहसासों के पनपने का भान नहीं था |
"पता है तुषार, आज न ,बासु क्या पूछता है मुझे ? तुम तुषार को कैसे जानती हो? अरे, मैंने कहा हम साथ काम करते हैं " कोमल ने तुनकते हुए कहा |
"उसे इतनी तुम्हारी फ़िक्र क्यों हो रही है ? और उसने ऐसा सवाल क्यूँ किया ..." हंसते हुए तुषार बोला |
"छोडो उसे , अच्छा बताओ , इस इस्शु को कैसे सोल्व करें.." बात घुमाते हुए कोमल ने काम शुरू कर दिया | बात आई गयी हो गयी |
"पता है मुझे न प्रॉब्लम है कुछ, थोडा हेल्प कर पाओगे तुषार " शेर मिजाज़ वाली कोमल की एक बार मिमियाती सी आवाज़ सुन मुझे बड़ा अचम्भा हुआ |
"हे बड़ी, वाट्स अप्? " तुषार अपने अंदाज़ से बोल पड़ा |
"तुषार मेरे मन में कुछ गलत भावनाएं आ रही हैं कुछ , पता नहीं कैसे और क्यूँ | मैं इनसे लड़ने की बहुत कोशिश कर रही हूँ पर ये मेरे मन से जाती ही नहीं हैं , गलत भावनाओं पर काबू कैसे करते हैं तुषार , अगर तुम्हें पता हो तो बताओगे |" कोमल ने सहजता से अपने मन की बात कही |
"नहीं कोमल, हम सबके मन में कई तरह की बातें आती हैं , पर बुरे भावनाओं को बुरा जान पाना , ये भी एक अच्छे इंसान की पहचान होती है | अब देखा तो, मुझे इतनी बार मन करता है की अपने इस गधे बॉस को जाकर दो थप्पड़ मार कर आऊँ पर कभी मैंने ये नहीं सोचा की ये भावना गलत है | तुम अपनी भावना में गुड-बेड़ फर्क कर पा रही हो , बड़ी बात है ! " तुषार ने काम करते करते कहा |
"ओफ्फो मैंने कोई सर्टिफिकेट नहीं माँगा तुमसे की मैं गुड हूँ की बेड़ .... मैं परेशान हूँ .... की मेरा मन मेरा कहा नहीं मानता .... यहाँ वहां भटकता है ... मन काबू मैं कैसे करते हैं ???..... " कोमल वाकई परेशान लग रही थी |
"अरे यार ये जो प्रोब्लेम्स होते हैं न , छोटे मोटे और तेम्पोरारी होते हैं, देखो तुम्हारी जो प्रॉब्लम है , जो कुछ भी है , ज्यादा बड़ी नहीं है, इश्वर का ध्यान करो .... और ये छोटे मोटे प्रोब्लेम्स को भूल जाओ ... " तुषार बड़े ज्ञानी की तरह कह रहा था |
"तुम्हें किसने कहा की मेरा प्रॉब्लम छोटा है..... काम में बिलकुल ध्यान नहीं लग रहा ..... यार मुझे खुद में कोई और मिल रही है जो मेरी बात न सुनती है और न ही सुनना चाहती है .... मुझे अपने आप को वापस पाना है तुषार ... कुछ सुझाव दो.."
कोमल की बात मुझे कुछ कुछ समझ आ रही थी|
"उपवास किया है तुमने कभी? देखो, मुझे जीवन में सबसे अच्छा लगता है- अच्छा खाना | लेकिन खुद पर काबू सबसे पहले शुरू होती है -उपवास से - जब आप अपनी ज़रूरतों को रोक पाते हैं | कभी उपवास कर के देखो , देखना तुम्हारे सब प्रोब्लेम्स यूं ठीक हो जायेंगे... यूं " चुटकी बजा बजा कर तुषार जवाब दे रहा था |
अगले दिन फोन पर कोमल अपने शेर अंदाज़ से कह रही थी - "नहीं आज तुम अपना काम करो , मेरे पास बहुत पेंडिंग वर्क है, शायद हफ्ता भर लग जाए, चलो मेरा काम हो जाए तो बताऊंगी, तब तक तुम अपना काम करो, और मैं अपना काम करूंगी .. ..... नहीं .... चाहे जितनी देर लगे .... अब ऐसे ट्राई करेंगे... ओके तो फिर बाय " कोमल की बोली असामान्य थी , कोई भी जान सकता था |
दो तीन हफ्तों तक कोई आवाज़ नहीं पड़ी कानों में |
मुझे बहुत जिज्ञासा हुई की क्या हो गया ? क्या दोनों में कोई झगडा हो गया था ? आखिर हमेशा हंसने बोलने वाले इन दोनों बच्चों में क्या अन-बन हो गयी ? अरे प्यार हो गया है तो आपस में बात कर लो , शादी कर लो.. हाँ?
मैं उनकी हंसी और किलकारी बहुत मिस कर रही थी |
फिर से सन्नाटे और नीरवता का राज था |
एक दिन मैंने सोचा की कोमल से बात की जाए | कितनी हैरत की बात है न की इतने पास रहते हुए भी कितनी बार आप लोगों को पहचानते नहीं हैं | सोचा आज मौका है चलो दोस्ती की जाये |
क्यूब के बाहर पहुँच कर हल्का सा नोक् किया ही था की कोमल ने मेरी और देखा |
"हेल्लो मेरा नाम दिव्या है और मैं आपके क्यूब की उस और बैठती हूँ, आपसे कभी मिलना नहीं हुआ , सोचा आज हेल्लो कहूँ |" होंटों पर हंसी लाने की कोशिश करते हुए मैने कहा |
"ओ वाऊ ! मुझे तो पता ही नहीं था की कोई उस और भी है | लास्ट मंथ तो खाली था | क्या अभी आये हो?" कोमल आश्चर्य चकित थी|
"हाँ , अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं यहाँ |" उसके क्यूब में नज़र दौड़ते हुए मैंने कहा|
आँख एक फॅमिली फोटो पर अटक गयी | पूछा मैंने -"ये किसकी फॅमिली है? बड़ी प्यारी बच्ची है "
"ये गुडिया है..... मेरी बेटी " मुस्काते हुए कोमल का उत्तर सुनकर बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आप को संभाला |
"सो क्यूट ........"कहकर फिर मैं अपनी क्यूब की तरफ वापस आ गयी |
रह रह कर मन घूम रहा था | मेरी तंद्रा तब टूटी जब एक पहचानी आवाज़ ने मुझे चौंकाया -"हे बड़ी !"
आवाज़ तुषार की थी, कोमल के क्यूब से -- ".... और सुनो ....सोनिया कहती है अबके प्रिअस लेंगे, बताओ तो सिविक ठीक रहेगा या प्रिअस ? पहले ये कहो की तुम ने मुझसे बात क्यों नहीं की इतने दिनों से ?... इतना भाव क्यों खा रही हो ?? " तुषार का लहजा वही था ...सामान्य ... नैचुरल .....
कोमल अपना काम करते करते ही कह रही थी - "उपवास कर रही थी ....तुमने बताया था न ... हर प्रॉब्लम सोल्व हो जाती है ... मेरी तो नहीं हुई ...... कुछ और उपाय बताओ..."
"अरे अभी तो जन्माष्टमी में दो दिन हैं , तुम्हारे यहाँ क्या पहले से ही करने लगते हैं , किस चीज़ का उपवास है तुम्हारा ?" मैं तुषार के इस भोले सवाल पर हैरान थी | क्या सचमुच वो इतना नादान था?
"तुम्हें इससे क्या मतलब है ? तुम तो मुझे कोई रास्ता बताओ की अगर मैं कुछ गलत सोच रही हूँ तो मुझे क्या करना चाहिए ? .....तुम तो बड़े प्रक्टिकल हो .. तुम्हें पता होगा ...." तुषार को देखते हुए कोमल ने धीमे से पूछा |
"सही है , प्रक्टिकल होना चाहिए .... देखो अगर तुम अपने प्रॉब्लम से राहत चाहती हो तो कोई दूसरी बड़ी प्रॉब्लम को ले आओ ... नहीं तो पेनांस अर्थात प्रायश्चित करो...अगर तुमसे जाने अनजाने कोई गलती हो रही है तो इस बात की खुद को सज़ा दो... फिर अपने आप ही गलती करना बंद हो जायेगी | सही कहा न मैंने ?" कोमल की टेबल पर रखे किताब को बिना पूछे उठा कर तुषार पढने लगा|
"पेनांस... प्रायश्चित ... हाँ सही है .... वही सही है " बुदबुदाते हुए कोमल की आवाज़ बंद हो गयी |
मैंने अपने आई फोन को कानों में लगाया |
सच है - बुरी बात है औरों की बातें सुनना ...
क्या करें ये क्यूबिकल भी कितने खुले होते हैं न .... भावनाओं जैसे ...
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Tuesday, August 11, 2009
Saturday, November 29, 2008
मुड मुड के ना देख ...मुड मुड के ...
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" सुजाता, कॉफी पीने चलोगी?" बहुत सकपकाते हुए तन्मय पूछ पाया था फ़ोन पर|
"चलो" एक शब्द का जवाब सुनकर शायद तन्मय को बहुत हैरानी हुई| सोचा था कुछ सवाल जवाब होगा | क्यों ? कहाँ ? कब ? कैसे ? कितनी सारी प्रक्टिस भी की थी उसने उन सवालों का अंदेशा कर के| सोचने लगा अब भूमिका कैसे बाँधूं? ...
कुछ देर की चुप्पी के बाद कुछ कुछ रटा रटाया बाहर आ ही गया -"दरअसल, मुझे बहुत ज़ोर से सर दर्द हो रहा है , इसलिए कॉफी पीने का मन कर रहा था | सो मैंने सोचा की अगर तुम भी चलती तो कुछ देर बैठ कर पुराने दिनों की बातें करते | कितना वक्त गुज़र गया है इस दौरान , है ना ? "
"हाँ, सही कह रहे हो ! काफ़ी कुछ गुज़र गया है...खैर , चलो " पीछे कंप्यूटर की टिक टिक बता रही थी की सुजाता फ़ोन पर बात करते करते अपना काम किए जा रही थी| इंसान कितने सारे काम एक साथ कर सकता है - फ़ोन पर बात करना, कंप्यूटर पर काम करना, पुरानी बातें याद करना, सोचना , मुस्कुराना ....
कहने को तो इंजीनियरिंग कॉलेज था पर बेहद रुढिवादी विचार धारा के लोग रहते थे वहां | आज के ज़माने की तरह चलन नहीं था तब | प्यार की कोई जुबां नहीं होती थी , कुछ कहा नहीं जाता था ............... शायद उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी | आपस की समझ बहुत तेज़ होती थी | हाँ , तभी तो प्रोफ़ेसर के सवाल पर कई बार सुजाता और तन्मय का जवाब एक ही साथ आता था ... एक ही जवाब ....चाहे सही हो या ग़लत ... फिर सबका हँसना .......... और दोनों का झेंपना ! आज कल कहाँ वो मासूमियत रही | शायद आज भी इश्क होता है , होता होगा .....
चार सालों में मुश्किल से चार बार उन्हें ऐसा वक्त मिला होगा जिसमे तसल्ली से वे कुछ बतिया सके हों | और उन्ही चार मुलाकातों में एक वो भी था-- फैरवेल पार्टी का आखरी दिन जब उन दोनों को मिल कर हॉल के गेट को सजानाथा | यूँ तो छः लोगों को मिल कर करना था ये काम पर जहाँ बाकी लोक नौ बजे की जगह ग्यारह बजे पहुंचे थे , तन्मय वहां पर सुबह आठ बजे से बैठा था | कोई बात नहीं हुई थी पर जाने कैसे सुजाता भी वहां सवा आठ बजे ही आ गई |
"मैं सोच रहा था की काम जल्दी हो जाए इसीलिए आ गया " तन्मय हड़बड़ी में कह उठा |
"ओफ्फो , मैंने तुमसे पूछा है क्या ? वो हथौडा देना " मुंह में सुई पकड़े सुजाता ने कहा |
"ये लो ..." बिना देखे हथौडा देते हुए हाथ अचानक सुजाता के हाथ से टकरा गया | हथौडा गिर गया | सुजाता के पाँव पर |
"आय ऍम सो सॉरी , ओह माय गौड़ ! रियली सॉरी ..." बड़े ही खेद भाव से तन्मय कहता गया, बार बार |
"इट्स ओके , अब अपना काम करो , सब लोग आते ही होंगे " सुजाता ने दर्द छुपाते हुए कहा |
"सुजाता , सुना है तुम प्लेसमेंट नहीं ले रही हो, डिग्री के बाद क्या प्लान है ? क्या शादी वादी..." कहना कुछ था और कुछ और ही कह रहा था |
"अरे नहीं ! अभी तो कुछ बनना है , आगे पढ़ना है ... अमेरिका जाना है .... और तुम क्या बनने की सोच रहे हो ?
"कुछ न कुछ.... तो बन ही जाऊंगा .." मायूसी छुपाने की कोशिश करते तन्मय ने कहा |
"हाँ तन्मय , तुम वाकई कुछ बन गए हो " कॉफी पीने जाते हुए सुजाता ने कहा |
"तुम ने भी तो बहुत नाम कर लिया है बहुत अच्छा लगा सुनकर , वैसे मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था , इसीलिए कॉफी पीने को तुम्हें कहा था , वरना और कोई बात नहीं है " तन्मय दोबारा सफाई दे रहा था |
"मैंने तुमसे पूछा है क्या ? तुम भी न....." मुंह बिचकाते हुए सुजाता बोली |
"क्या पिओगी?" कैफे में तन्मय ने पूछा |
"नहीं मैं अभी खाना खा कर आई हूँ , तुम पियो , मैं तो सिर्फ़ वाक करने के लिए आई थी | तुम ले लो ..फिर गप्पे मारेंगे..." कहते हुए वो काउंटर से दूसरी और चली गई |
सुजाता ने अभी अभी नई नौकरी शुरू की थी | पहले ही मीटिंग में एक पहचाने चेहरे को देख सुजाता की बोलती बंद हो गई थी | यहाँ तक की जब उसके बोलने की बारी थी तब भी उसे कुछ सूझ नहीं रहा था | क्या टी.के. ही तन्मय था ???? इतनी बार ईमेल से बात चीत हुई होगी इस टी.के के साथ , और कभी भी इसने बताया नहीं की ये ही ...| इसे तो पता होगा ....शायद नहीं...... नहीं नहीं ज़रूर पता होगा .... और फिर भी नहीं बताया .... क्यों?
सामने तन्मय एक कॉफी के दो हिस्से कर रहा था |
" क्यों कॉफी ठंडा कर रहे हो ? मिस्टर टी के ! " व्यंग करते हुए सुजाता बोली |
"हा हाहा हाहा दरअसल , एक साल से तुम्हें पहचान गया था पर कभी बात करने की हिम्मत नहीं हो पाई | फिर मैंने सोचा पता नहीं तुम यहाँ ज्वाइन करोगी भी या नहीं ... करो तो तुम्हे पता चल ही जायेगा और जो नहीं करो तो फिर नहीं की सी बात ...अरे हाँ कॉफी ठंडा नहीं कर रहा हूँ , तुम्हारे लिए आधा अलग कर रहा हूँ | ये लो ... " कप थमाते हुए कुछ बूँदें छलक गयीं |
" ओह आय ऍम सो सॉरी , आई रियली ऍम " नैपकिन देते हुए तन्मय फिर से वही प्रतीत हो रहा था - वही दस साल पहले वाला तन्मय - भोला भाला - घबराया हुआ सा - साफ़ दिल में बहुत सारा प्यार लिए...पर तब भी कितनी बंदिशें थीं और अब भी हैं , सिर्फ़ नाम बदल गए हैं |
"तन्मय कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? और मैडम जॉब करती हैं ?" बात आगे बढाते हुए सुजाता ने पूछा |
"तुमसे एक बढ़कर है | तुम्हारे दो हैं और मेरे तीन हैं | मंजुला - माय वाइफ - काम नहीं करती है | अभी बच्चे छोटे हैं |" कॉफी पीते पीते तन्मय बोला |
"तुम्हें कैसे मालूम मेरे दो बच्चे हैं ? वैरी फनी !" सुजाता ज़रा घबरा गई |
" अरे डरो मत ! अक्तुअली मुझे हमारे डिपार्टमेन्ट के सब लड़कियों के बारे में बहुत कुछ पता है | मैं क्या..... मुझे लगता है , सब लड़कों को सब लड़कियों की हिस्ट्री और जिओग्राफी के बारे में बहुत कुछ पता होता है , और मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ , तो रूचि होना स्वाभाविक है " कहते कहते मुस्कुराने लगा|
सुजाता ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी |
"तुम बहुत बदल गए हो तन्मय, विश्वास नहीं होता की ये तुम कह रहे हो , सच विश्वास नहीं होता !" हँसी दबाते हुए सुजाता चहकी |
"पर तुम बिल्कुल वैसी ही हो सुजाता, बिल्कुल वैसी, जैसी थी..... हाँ ये बात तो मैं भी मानता हूँ की विश्वास मुझे भी नहीं होता .... कभी सोचा ही नहीं था की तुमसे कभी बात होगी .... इस तरह ... can't just believe it .... "बड़ी संजीदगी थी कहने में |
"अच्छा चलो अपनी फॅमिली फोटो दिखाओ मुझे .. और हाँ ये बताओ की क्या क्या शौक़ हैं जनाब के ? म्यूजिक , डांस , स्पोर्ट्स क्या ..."बात बदलने के लिए नई बात छेड़ी सुजाता ने |
"पैसा कमाना - अब बस एक ये ही शौक़ रह गया है | इंडिया से इसी के लिए यहाँ आया और अब भी यहीं पड़ा हूँ पर अभी तक ना ही फाइनेंस में और ना ही पोजीशन में कुछ कमाल कर पाया हूँ , बस यही दुःख रहता है |" मुट्ठी भींचते हुए वो उत्तेजित हो गया |
"अरे अरे , ऐसा मत कहो , भगवान् गुस्सा हो जायेंगे | इश्वर का दिया सब कुछ है तुम्हारे पास , अगर कदर नहीं करोगे तो फिर अच्छा नहीं होगा .....उसका शुक्रिया अदा करो और खुश रहो .... " मस्त होकर सुजाता बोली |
"तुम्हारी यही बात मुझे सीखनी है - लाइफ को फुल जीना | कैसे करती हो ? " तन्मय का एक बहुत ही टिपिकल स्टाइल है बात करने का , खासकर जब वो बातों में बहुत तल्लीन हो जाता था - अपने हाथों को चेहरे केसामने रख कर , आंखों को छोटा छोटा कर घूरने की दृष्टि से एक स्मित मुस्कान लिए, देखना |
"छोटी छोटी बातों में खुशी ढूँढो तन्मय ! बहुत हिम्मत, हौसला और सुकून पाओगे | वैसे भी किसे पता है कल का ; तो आज तो बिंदास होकर रहो न ... अरे एक बात तुम्हें याद है , जब में इंटर कॉलेज कांटेस्ट में गई थी तो तुमने एकगुड लुक्क चार्म दिया था मुझे - गणेश जी का एक लोकेट - पता है उसी लोकेट को थाम कर मैंने कितने सार कांटेस्ट जीते थे | बात किसी चीज़ की नहीं होती तन्मय, उसमे बसे विश्वास की होती है |" सुजाता बड़े भावः से कह रही थी और तन्मय उसे सुनकर , उसे देख कर मुस्कुराये जा रहा था |
"सुजाता, शादी के पहले किसी से दोस्ती नहीं हुई तुम्हारी ?" कुछ सुनने के ख्याल से सवाल उठाया तन्मय ने |
"मेरे बहुत सारे दोस्त हैं तन्मय | हाँ अगर तुम ये पूछ रहे हो की कोई अफयेर तो नहीं हुआ तो सुनो -इन सब बातों में लूक्स बहुत मायने रखता है - and I was never pretty enough !"
"I was ..what ?" तन्मय का अजीब सा सवाल आया |
"अच्छा बाबा आय वास नहीं , आय ऍम नोट प्रेटी एनफ , अब खुश ...?" सुजाता ने हँसते हुए कहा |
"अरे, मैं .." तन्मय बात पूरी नहीं कर पाया |
बहुत देर बातें होती रहीं- कुछ नई , कुछ पुरानी , कुछ हँसी, कुछ यूँ ही , कुछ अनकही, कुछ अनसुनी .....
"चलो चलते हैं बहुत बातें हो गयीं " उठते हुए सुजाता ने कहा|
कैफे के बाहर बारिश का मौसम था | हलके अंधेरे में स्ट्रीट लाइट की हलकी रौशनी सी छाई थी | बहुत सर्दी थी |
"चलो वापस चलते हैं, तुमने जैकेट भी नहीं पहनी है " अचानक सुजाता ने ध्यान दिया |
"नहीं नहीं , मुझे सर्दी नहीं लग रही है , कुछ और देर वाक कर सकते हैं , अगर तुम्हारा कोई ज़रूरी काम न हो " तन्मय बुदबुदाते हुए चल रहा था |
" अरे वाह ! देखो न कितना सुंदर है ये सीन , आय मीन , पूरा मैरीन ड्राइव लग रहा है , है न ?" सुजाता ने कहा |
वो शाम का नज़ारा , बारिश की बूँदें , हलोजन बल्ब की मध्हम रोशनी ,हरसू खामोशी , उस पल का एहसास , किसी का साथ और दिल में सुकून , क्या कोई दौलत ऐसी खुशी दे सकता है | पता नहीं ...शायद नहीं....
तन्मय ने बहुत ही धीरे से कहा -"पता है सुजाता मैं करीब दस साल से इसी रस्ते जाता हूँ पर कभी देखा नहीं था शायद कभी ध्यान गया ही नहीं | वाक़ई आज बहुत सुंदर लग रहा है |"
वक्त बीतता रहा | देखते देखते ट्रेल पूरा हो गया |
"दरअसल मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था, तभी मैंने कॉफी के लिए कहा था , वरना मैं तुम्हें दीस्तर्ब नहीं करता " कहते कहते तन्मय लिफ्ट से बाहर आ कर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गया |
"ओफ्फो " सुजाता ने लिफ्ट का दरवाज़ा बंद किया |
सुजाता अब लिफ्ट में अकेली थी |
"तन्मय , तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और हरदम रहोगे , और ये तुम जानते भी हो ....
... पर अब वक्त बदल गया है , ज़िन्दगी बदल गई है तन्मय , अब मुझे एक औरत की तरह नहीं एक दोस्त की तरह देखो तन्मय वरना ..... पता नहीं .... " सुजाता लिफ्ट में खड़ी खड़ी अपने आप से बात कर रही थी | सोच सोच कर खिल खिला रही थी |
"सोचो तो , अगर मैं आज के इस किस्से को मोनिका को बताऊँ तो हॉस्टल मैं कितन हल्ला होगा - ओहो ! सुजाता कॉफी पीने गई थी , तन्मय के साथ , क्या क्या हुआ , बताओ न , क्या बातें हुयीं ? और.. साथ चाय पीना , और वों भी आधी आधी , बाकी गर्ल्स कितना जलेंगी ... आमने सामने बैठ कर बातें करना , कितना धमाका होगा हॉस्टल में, और फिर हम दोनों का साथ साथ टहलना, कॉलेज में जैसे आग लग जायेगी...
shut up , सुजाता कॉलेज बीते अरसा गुज़र गया है | ये ज़िन्दगी है , कॉलेज नहीं ....
सुजाता ने अपने पॉकेट से कुछ निकाला और मुस्कुराने लगी | कुछ खास नहीं था , एक पुराना सा गुड लक् चार्म था गणेशजी का ....
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" सुजाता, कॉफी पीने चलोगी?" बहुत सकपकाते हुए तन्मय पूछ पाया था फ़ोन पर|
"चलो" एक शब्द का जवाब सुनकर शायद तन्मय को बहुत हैरानी हुई| सोचा था कुछ सवाल जवाब होगा | क्यों ? कहाँ ? कब ? कैसे ? कितनी सारी प्रक्टिस भी की थी उसने उन सवालों का अंदेशा कर के| सोचने लगा अब भूमिका कैसे बाँधूं? ...
कुछ देर की चुप्पी के बाद कुछ कुछ रटा रटाया बाहर आ ही गया -"दरअसल, मुझे बहुत ज़ोर से सर दर्द हो रहा है , इसलिए कॉफी पीने का मन कर रहा था | सो मैंने सोचा की अगर तुम भी चलती तो कुछ देर बैठ कर पुराने दिनों की बातें करते | कितना वक्त गुज़र गया है इस दौरान , है ना ? "
"हाँ, सही कह रहे हो ! काफ़ी कुछ गुज़र गया है...खैर , चलो " पीछे कंप्यूटर की टिक टिक बता रही थी की सुजाता फ़ोन पर बात करते करते अपना काम किए जा रही थी| इंसान कितने सारे काम एक साथ कर सकता है - फ़ोन पर बात करना, कंप्यूटर पर काम करना, पुरानी बातें याद करना, सोचना , मुस्कुराना ....
कहने को तो इंजीनियरिंग कॉलेज था पर बेहद रुढिवादी विचार धारा के लोग रहते थे वहां | आज के ज़माने की तरह चलन नहीं था तब | प्यार की कोई जुबां नहीं होती थी , कुछ कहा नहीं जाता था ............... शायद उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी | आपस की समझ बहुत तेज़ होती थी | हाँ , तभी तो प्रोफ़ेसर के सवाल पर कई बार सुजाता और तन्मय का जवाब एक ही साथ आता था ... एक ही जवाब ....चाहे सही हो या ग़लत ... फिर सबका हँसना .......... और दोनों का झेंपना ! आज कल कहाँ वो मासूमियत रही | शायद आज भी इश्क होता है , होता होगा .....
चार सालों में मुश्किल से चार बार उन्हें ऐसा वक्त मिला होगा जिसमे तसल्ली से वे कुछ बतिया सके हों | और उन्ही चार मुलाकातों में एक वो भी था-- फैरवेल पार्टी का आखरी दिन जब उन दोनों को मिल कर हॉल के गेट को सजानाथा | यूँ तो छः लोगों को मिल कर करना था ये काम पर जहाँ बाकी लोक नौ बजे की जगह ग्यारह बजे पहुंचे थे , तन्मय वहां पर सुबह आठ बजे से बैठा था | कोई बात नहीं हुई थी पर जाने कैसे सुजाता भी वहां सवा आठ बजे ही आ गई |
"मैं सोच रहा था की काम जल्दी हो जाए इसीलिए आ गया " तन्मय हड़बड़ी में कह उठा |
"ओफ्फो , मैंने तुमसे पूछा है क्या ? वो हथौडा देना " मुंह में सुई पकड़े सुजाता ने कहा |
"ये लो ..." बिना देखे हथौडा देते हुए हाथ अचानक सुजाता के हाथ से टकरा गया | हथौडा गिर गया | सुजाता के पाँव पर |
"आय ऍम सो सॉरी , ओह माय गौड़ ! रियली सॉरी ..." बड़े ही खेद भाव से तन्मय कहता गया, बार बार |
"इट्स ओके , अब अपना काम करो , सब लोग आते ही होंगे " सुजाता ने दर्द छुपाते हुए कहा |
"सुजाता , सुना है तुम प्लेसमेंट नहीं ले रही हो, डिग्री के बाद क्या प्लान है ? क्या शादी वादी..." कहना कुछ था और कुछ और ही कह रहा था |
"अरे नहीं ! अभी तो कुछ बनना है , आगे पढ़ना है ... अमेरिका जाना है .... और तुम क्या बनने की सोच रहे हो ?
"कुछ न कुछ.... तो बन ही जाऊंगा .." मायूसी छुपाने की कोशिश करते तन्मय ने कहा |
"हाँ तन्मय , तुम वाकई कुछ बन गए हो " कॉफी पीने जाते हुए सुजाता ने कहा |
"तुम ने भी तो बहुत नाम कर लिया है बहुत अच्छा लगा सुनकर , वैसे मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था , इसीलिए कॉफी पीने को तुम्हें कहा था , वरना और कोई बात नहीं है " तन्मय दोबारा सफाई दे रहा था |
"मैंने तुमसे पूछा है क्या ? तुम भी न....." मुंह बिचकाते हुए सुजाता बोली |
"क्या पिओगी?" कैफे में तन्मय ने पूछा |
"नहीं मैं अभी खाना खा कर आई हूँ , तुम पियो , मैं तो सिर्फ़ वाक करने के लिए आई थी | तुम ले लो ..फिर गप्पे मारेंगे..." कहते हुए वो काउंटर से दूसरी और चली गई |
सुजाता ने अभी अभी नई नौकरी शुरू की थी | पहले ही मीटिंग में एक पहचाने चेहरे को देख सुजाता की बोलती बंद हो गई थी | यहाँ तक की जब उसके बोलने की बारी थी तब भी उसे कुछ सूझ नहीं रहा था | क्या टी.के. ही तन्मय था ???? इतनी बार ईमेल से बात चीत हुई होगी इस टी.के के साथ , और कभी भी इसने बताया नहीं की ये ही ...| इसे तो पता होगा ....शायद नहीं...... नहीं नहीं ज़रूर पता होगा .... और फिर भी नहीं बताया .... क्यों?
सामने तन्मय एक कॉफी के दो हिस्से कर रहा था |
" क्यों कॉफी ठंडा कर रहे हो ? मिस्टर टी के ! " व्यंग करते हुए सुजाता बोली |
"हा हाहा हाहा दरअसल , एक साल से तुम्हें पहचान गया था पर कभी बात करने की हिम्मत नहीं हो पाई | फिर मैंने सोचा पता नहीं तुम यहाँ ज्वाइन करोगी भी या नहीं ... करो तो तुम्हे पता चल ही जायेगा और जो नहीं करो तो फिर नहीं की सी बात ...अरे हाँ कॉफी ठंडा नहीं कर रहा हूँ , तुम्हारे लिए आधा अलग कर रहा हूँ | ये लो ... " कप थमाते हुए कुछ बूँदें छलक गयीं |
" ओह आय ऍम सो सॉरी , आई रियली ऍम " नैपकिन देते हुए तन्मय फिर से वही प्रतीत हो रहा था - वही दस साल पहले वाला तन्मय - भोला भाला - घबराया हुआ सा - साफ़ दिल में बहुत सारा प्यार लिए...पर तब भी कितनी बंदिशें थीं और अब भी हैं , सिर्फ़ नाम बदल गए हैं |
"तन्मय कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? और मैडम जॉब करती हैं ?" बात आगे बढाते हुए सुजाता ने पूछा |
"तुमसे एक बढ़कर है | तुम्हारे दो हैं और मेरे तीन हैं | मंजुला - माय वाइफ - काम नहीं करती है | अभी बच्चे छोटे हैं |" कॉफी पीते पीते तन्मय बोला |
"तुम्हें कैसे मालूम मेरे दो बच्चे हैं ? वैरी फनी !" सुजाता ज़रा घबरा गई |
" अरे डरो मत ! अक्तुअली मुझे हमारे डिपार्टमेन्ट के सब लड़कियों के बारे में बहुत कुछ पता है | मैं क्या..... मुझे लगता है , सब लड़कों को सब लड़कियों की हिस्ट्री और जिओग्राफी के बारे में बहुत कुछ पता होता है , और मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ , तो रूचि होना स्वाभाविक है " कहते कहते मुस्कुराने लगा|
सुजाता ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी |
"तुम बहुत बदल गए हो तन्मय, विश्वास नहीं होता की ये तुम कह रहे हो , सच विश्वास नहीं होता !" हँसी दबाते हुए सुजाता चहकी |
"पर तुम बिल्कुल वैसी ही हो सुजाता, बिल्कुल वैसी, जैसी थी..... हाँ ये बात तो मैं भी मानता हूँ की विश्वास मुझे भी नहीं होता .... कभी सोचा ही नहीं था की तुमसे कभी बात होगी .... इस तरह ... can't just believe it .... "बड़ी संजीदगी थी कहने में |
"अच्छा चलो अपनी फॅमिली फोटो दिखाओ मुझे .. और हाँ ये बताओ की क्या क्या शौक़ हैं जनाब के ? म्यूजिक , डांस , स्पोर्ट्स क्या ..."बात बदलने के लिए नई बात छेड़ी सुजाता ने |
"पैसा कमाना - अब बस एक ये ही शौक़ रह गया है | इंडिया से इसी के लिए यहाँ आया और अब भी यहीं पड़ा हूँ पर अभी तक ना ही फाइनेंस में और ना ही पोजीशन में कुछ कमाल कर पाया हूँ , बस यही दुःख रहता है |" मुट्ठी भींचते हुए वो उत्तेजित हो गया |
"अरे अरे , ऐसा मत कहो , भगवान् गुस्सा हो जायेंगे | इश्वर का दिया सब कुछ है तुम्हारे पास , अगर कदर नहीं करोगे तो फिर अच्छा नहीं होगा .....उसका शुक्रिया अदा करो और खुश रहो .... " मस्त होकर सुजाता बोली |
"तुम्हारी यही बात मुझे सीखनी है - लाइफ को फुल जीना | कैसे करती हो ? " तन्मय का एक बहुत ही टिपिकल स्टाइल है बात करने का , खासकर जब वो बातों में बहुत तल्लीन हो जाता था - अपने हाथों को चेहरे केसामने रख कर , आंखों को छोटा छोटा कर घूरने की दृष्टि से एक स्मित मुस्कान लिए, देखना |
"छोटी छोटी बातों में खुशी ढूँढो तन्मय ! बहुत हिम्मत, हौसला और सुकून पाओगे | वैसे भी किसे पता है कल का ; तो आज तो बिंदास होकर रहो न ... अरे एक बात तुम्हें याद है , जब में इंटर कॉलेज कांटेस्ट में गई थी तो तुमने एकगुड लुक्क चार्म दिया था मुझे - गणेश जी का एक लोकेट - पता है उसी लोकेट को थाम कर मैंने कितने सार कांटेस्ट जीते थे | बात किसी चीज़ की नहीं होती तन्मय, उसमे बसे विश्वास की होती है |" सुजाता बड़े भावः से कह रही थी और तन्मय उसे सुनकर , उसे देख कर मुस्कुराये जा रहा था |
"सुजाता, शादी के पहले किसी से दोस्ती नहीं हुई तुम्हारी ?" कुछ सुनने के ख्याल से सवाल उठाया तन्मय ने |
"मेरे बहुत सारे दोस्त हैं तन्मय | हाँ अगर तुम ये पूछ रहे हो की कोई अफयेर तो नहीं हुआ तो सुनो -इन सब बातों में लूक्स बहुत मायने रखता है - and I was never pretty enough !"
"I was ..what ?" तन्मय का अजीब सा सवाल आया |
"अच्छा बाबा आय वास नहीं , आय ऍम नोट प्रेटी एनफ , अब खुश ...?" सुजाता ने हँसते हुए कहा |
"अरे, मैं .." तन्मय बात पूरी नहीं कर पाया |
बहुत देर बातें होती रहीं- कुछ नई , कुछ पुरानी , कुछ हँसी, कुछ यूँ ही , कुछ अनकही, कुछ अनसुनी .....
"चलो चलते हैं बहुत बातें हो गयीं " उठते हुए सुजाता ने कहा|
कैफे के बाहर बारिश का मौसम था | हलके अंधेरे में स्ट्रीट लाइट की हलकी रौशनी सी छाई थी | बहुत सर्दी थी |
"चलो वापस चलते हैं, तुमने जैकेट भी नहीं पहनी है " अचानक सुजाता ने ध्यान दिया |
"नहीं नहीं , मुझे सर्दी नहीं लग रही है , कुछ और देर वाक कर सकते हैं , अगर तुम्हारा कोई ज़रूरी काम न हो " तन्मय बुदबुदाते हुए चल रहा था |
" अरे वाह ! देखो न कितना सुंदर है ये सीन , आय मीन , पूरा मैरीन ड्राइव लग रहा है , है न ?" सुजाता ने कहा |
वो शाम का नज़ारा , बारिश की बूँदें , हलोजन बल्ब की मध्हम रोशनी ,हरसू खामोशी , उस पल का एहसास , किसी का साथ और दिल में सुकून , क्या कोई दौलत ऐसी खुशी दे सकता है | पता नहीं ...शायद नहीं....
तन्मय ने बहुत ही धीरे से कहा -"पता है सुजाता मैं करीब दस साल से इसी रस्ते जाता हूँ पर कभी देखा नहीं था शायद कभी ध्यान गया ही नहीं | वाक़ई आज बहुत सुंदर लग रहा है |"
वक्त बीतता रहा | देखते देखते ट्रेल पूरा हो गया |
"दरअसल मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था, तभी मैंने कॉफी के लिए कहा था , वरना मैं तुम्हें दीस्तर्ब नहीं करता " कहते कहते तन्मय लिफ्ट से बाहर आ कर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गया |
"ओफ्फो " सुजाता ने लिफ्ट का दरवाज़ा बंद किया |
सुजाता अब लिफ्ट में अकेली थी |
"तन्मय , तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और हरदम रहोगे , और ये तुम जानते भी हो ....
... पर अब वक्त बदल गया है , ज़िन्दगी बदल गई है तन्मय , अब मुझे एक औरत की तरह नहीं एक दोस्त की तरह देखो तन्मय वरना ..... पता नहीं .... " सुजाता लिफ्ट में खड़ी खड़ी अपने आप से बात कर रही थी | सोच सोच कर खिल खिला रही थी |
"सोचो तो , अगर मैं आज के इस किस्से को मोनिका को बताऊँ तो हॉस्टल मैं कितन हल्ला होगा - ओहो ! सुजाता कॉफी पीने गई थी , तन्मय के साथ , क्या क्या हुआ , बताओ न , क्या बातें हुयीं ? और.. साथ चाय पीना , और वों भी आधी आधी , बाकी गर्ल्स कितना जलेंगी ... आमने सामने बैठ कर बातें करना , कितना धमाका होगा हॉस्टल में, और फिर हम दोनों का साथ साथ टहलना, कॉलेज में जैसे आग लग जायेगी...
shut up , सुजाता कॉलेज बीते अरसा गुज़र गया है | ये ज़िन्दगी है , कॉलेज नहीं ....
सुजाता ने अपने पॉकेट से कुछ निकाला और मुस्कुराने लगी | कुछ खास नहीं था , एक पुराना सा गुड लक् चार्म था गणेशजी का ....
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