ऑफिस का काम ख़त्म नहीं हुआ था | पर मन ही नहीं लग रहा था | छोडो कल करेंगे ... किसी भी बात में फोकस नहीं हो रहा था | कार के ऑन होते ही सी डी प्लेयर बज उठा | दिन का सबसे अच्छा वक़्त होता है बिना कुछ सोचे , बिना किसी शोर के, बस चुप चाप गाना सुनना , कोई भी ...
मर जावां मर जावां ...........तेरे इश्क पे.. मर जावां
भीगे भीगे सपनो का जैसे ख़त है
हाय.. गीली गीली चाहत की जैसे लत है ,
मर जावां मर जावां .........तेरे इश्क पे.. मर जावां
"आकांक्षा तुम न बिलकुल क्रेजी हो , कुछ भी बोलती हो , और ये नया स्टाइल क्या है , लफंगों जैसा... "टपका डालने का "... ओह माई गौड़ , तुम्हारा कुछ नहीं बन सकता ... " चादर समेटते हुए साधना ने कहा |
हॉस्टल में एक कमरे में तीन लड़कियां रहती थीं | तीनों के बिस्तर जैसे उनके मालिकों की गाथा सुनाती थी | साधना के बिस्तर पर हमेशा उसकी किताबें सोती थीं -बिखरी हुईं, चाहे परीक्षा हों या नहीं, ठीक उसी तरह जैसे चारु के बेड पर नेल पोलिश और मेक अप का सामान हरदम डेरा लगाए रहता था | जिस दिन ड्रेस के साथ मेचिंग इअर टोप्स या नेकलेस नहीं मिलता था उस दिन चारु का क्लास में दिल नहीं लगता था | आकांक्षा के तो कहने ही क्या थे | सबसे साफ़ सुथरा बेड उसी का होता था | हो भी क्यूँ नहीं , कभी इस्तेमाल हो तो मैला हो न !
"आइसा क्या, बोले तो राजा आइसा इच बोलता है तो भीडू अपुन भी ... क्या है न अपुन का स्टाइल है, क्या !" कोलर खीचते हुए आकांक्षा ने कहा |
"राजा तुम्हारा नया दोस्त है क्या?" चादर झाड़ के बिछाते हुए साधना ने पूछा |
"यू आर सो डम, एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते - "मैंने प्यार किया" पिक्चर का मारा हुआ है ये डैलोग... " बिस्तर पर पसरते हुए आकांक्षा ने कहा |
"क्यूँ नहीं हो सकते अक्कू ? जैसे तुम मेरी दोस्त हो , वैसे ही कोई लड़का भी तो मेरा दोस्त हो सकता है ना !" बिस्तर के किनारों पर चादर खोंचते हुए साधना बोली |
"ओ मैडम , तेरी शादी होने वाली है , अपने पति परमेश्वर को मत कहना की कोई लड़का मेरा "दोस्त" है वर्ना शादी से पहले ही तेरा तलाक हो जायेगा |" कानों में वाक्मेन देते हुए जवाब दिया गया |
"मुझे लगता है दोस्ती अपनी जगह है और हर रिश्ता अपनी जगह | रिश्ते बनाए जाते हैं पर दोस्त हम खुद चुनते हैं | जहाँ सोच मिलती है दोस्ती होना स्वाभाविक है , चाहे वो लड़का हो या लड़की..... नहीं क्या? "
"बोले तो.... तेरी बात झक्कास है बाप ! पर अखा वर्ल्ड में कोई ऐसा मर्द नहीं मिलेंगा जो किसी औरत को एक औरत के फॉर्म में नहीं देखेंगा .. वोले तो ... औरत में एक दोस्त देखने से पहले दोस्त में औरत को पहले देखेंगा ... अपना चल्लिंज है बॉस ...शर्त लगा के बोलता है बाप ... लड़का लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते .. " कुछ और कहने ही वाली थी की हॉल से किसी ने चिल्ला कर कहा - "आकांक्षा विसिटर फॉर यू !"
"पीईन्न्न्न्न्न्न्न" पीछे से किसी ने जोर से हार्न दिया तो ध्यान १०१ के फ्रीवे पर वापस आया |
सी डी अब भी गाना सुना रही थी |
सोचे, दिल के ऐसा काश हो ....... तुझको एक नज़र...... मेरी तलाश हो ,
हो जैसे ख्वाब है आँखों में बसे मेरी , ..........वैसे नींद पे सलवटे पड़े तेरी ........
भीगे भीगे अरमानो की ना हद है ...........
हाय.. गीली गीली ख्वाहिश भी तो बेहद है !!!!!!!
मर जावां ............मर जावां ...........तेरे इश्क पे............मर जावां |
गाडी सामने रोकी ही थी की आकांक्षा बाहर आ गयी | इतने सालों बाद भी ये बिलकुल वैसी ही है ...
"गाडी चलाती हो या बैलगाडी चलाती हो ? मेरी फ्लाईट मिस ना हो जाए | भागो ...." अपना सूटकेस गाडी के पीछे सीट पर फेंकते हुए आकांक्षा चिल्ला उठी | "और ये देवदास सी शक्ल क्यूँ बनायी है ? कौन मर गया ? मरा तो मर गया तुम इतना टेंसन क्यूँ ले रही हो ? " बिना कुछ सुने कहते जाना आकांक्षा की पुरानी आदत है|
"कुछ नहीं , साउथ वेस्ट की फ्लाईट है क्या ? कितने बजे की है | वापस कब आओगी ? पिक कर लूं तुम्हें ?" बात घुमाते हुए साधना गाडी घुमाने लगी|
"अबे , अभी गयी ही नहीं और आने की टेंशन ...तुम या तो गए कल में रहती हो या आने वाले में, आज में क्यूँ नहीं रहती हो? यू आर इम्पोसिबल ! " बहुत प्यार करती है आकांक्षा, पर कुछ लोगों के इज़हार का तरीका अलग होता है|
"अक्कू, विश्वास ने मुझे हर्ट किया | पता है.." शब्द ढूँढने में लग गयी साधना .............. " तुम सच कहती थी आकांक्षा - दोस्ती नहीं होती किसी भी आदमी-औरत में - सिर्फ एक तलाश होती है , पता नहीं क्या ढूंढते हैं एक दूसरे में | गलती मेरी ही होगी | शायद मेरे ही इशारे गलत होंगे | मुझे लगा की अच्छी अच्छी बातों से मैं किसी की डिप्रेसन दूर कर दूँगी | फिर कुछ ऐसा कहा उसने की मेरी बोलती बंद हो गयी ........
मेरा विश्वास टूट गया आकांक्षा आज मेरा विश्वास सचमुच टूट गया ............"
सी डी के गीत को बदलने की कोशिश कर रही थी साधना | और आकांक्षा अपने आई फ़ोन पर अपने ईमेल चेक किये जा रही थी |
"तुम्हें मुझ पर बहुत हंसी रही होगी ना | कितनी सिल्ली बातों पर ध्यान देती है | खुद तो परेशान होती है ही औरों को भी परेशान कर देती है | सॉरी यार , तुम अपना काम करो | "साधना हडबडा कर कह रही थी |
एक के बाद एक गीत बदल रही थी साधना, शायद मन नहीं बना पा रही थी की कौन सा गाना सही है |
किसी एक पर हाथ रुक गया ..
आकांक्षा ने आई फ़ोन एक तरफ रखा और कहा -"क्या हुआ डिंकी, इतनी सी बात पर इतना तूफ़ान क्यूँ उठा रही हो ? घंटों घंटों बात कर सकती हो पर किसी ने छू क्या लिया तो क्या दाग लग जायेगा तुम्हें .. दाग .. माय फ़ुट ? ये सती सावित्री का नाटक तो रहने ही दो | अच्छा बताओ, तुमने अपनी हर प्रॉब्लम उसके साथ शेयर की है की नहीं , यहाँ तक की मुझे लगता है की मुझे भी जो बातें नहीं बतायीं उसे बताई होंगी क्योंकि जितना तुमको मैं जानती हूँ, तुम्हारे पेट में कुछ बात तो रुकेगी नहीं .." हंसते हुए आकांक्षा कह गयी |
"हाँ , ये तो सच है, तभी तो लगा की हम अच्छे दोस्त हैं ... या शायद ..... थे ... की हम हर दुःख सुख में साथ थे | लगता था की कोई है जो समझता है | पर हर रिश्ते की एक सीमा होती है ना , एक मर्यादा होती है , है की नहीं ,हाँ ? बताओ तुम? हाँ ?" अपनी बात का समर्थन चाह रही थी साधना |
" ओ मेरी धन्नो रानी ! ये शरीर कुछ नहीं होता है | आज मरे तो लोग कल दो दिन कहेंगे | अगर तुम मन से किसी से जुड़े हो तो तन का मिलना कोई पाप नहीं होता |" आकांक्षा माडर्न है |
"ये लो मैं किस से पूछ बैठी | तुम मेरी बात कभी समझ ही नहीं पाओगी..... तुम बिलकुल मेरे जैसी नहीं हो ... या फिर मैं तुम्हारे जैसी नहीं हूँ.. पता नहीं क्यूँ या फिर कैसे हम आज तक निभा पा रहे हैं ? अब देखो , तुम भी तो मेरी दोस्त हो, तुमने तो कभी नहीं कहा की तुम मुझे .... वैल.. जाने दो ... | हर चीज़ कायदे में ही अच्छी लगती है | और फिर .." अपनी बात को जस्टिफाई करने की जैसे सोच ली हो साधना ने | ड्राप ऑफ़ ज़ोन आ चुका था |
"तुम अगर ज़रा सी भी सुन्दर होती तो मेरे मन में ये बात आ सकती थी | क्या करें ..... यू आर नॉट सेक्सी एनफ फॉर मी! अब पता नहीं उसे क्या दिखा | एक काम करो, उसे मेरा फोन नंबर देना | वैसे वो इतना बुरा भी नहीं है | जब तुम उसको मेरे साथ देखोगी और जलोगी तब भागी भागी आओगी ....हा हा हा हा हा " आकांक्षा हंसती है, तो बहुत जोर से हंसती है |
"ओफ्फो अब बस करो , जाओ तुम्हारी फ्लाईट न मिस हो जाये , हेप्पी जर्नी " उसे विदा अब के साधना एयर पोर्ट पर ही कुछ देर रुक गयी |
देख रही थी साधना लोगों को अपने प्रिय जनों को छोड़ते हुए .. कोई गले मिल रही थी तो कोई आंसू बहा रहा था | कितना दुःख होता है न किसी अपने को विदा करते हुए ... सोच रही थी ...काश मुझे भी कोई रुला दे | रोना अच्छा होता है , दिल हल्का हो जाता है ...दिल इतना भारी लग रहा था पर रोना ही नही आ रहा था | सी डी पर गाना अब भी बज रहा था |
देखो तो , बिना शिकायत किये ये मशीन बजता ही रहता है , ये मशीन बनना कितना अच्छा होता है | बस जो करना है, सो करना है | कोई आव नहीं , भाव नहीं , ताव नहीं, चाव नहीं ,तनाव नहीं , ... कुछ भी तो नहीं होता है ... हाँ , मशीन बनना सबसे फायदेमंद होता है
... चलो मशीन बन जाते हैं |
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Friday, April 10, 2009
Friday, March 27, 2009
फूल भी हो दरमियाँ तो फासले हुए !
ईमेल दूसरी बार खोला .....सोच कर की शिष्टता के लिए ही सही , जवाब तो देना चाहिए |
पर फिर से बंद कर दिया .. नहीं , क्या फायदा ...फिर से वही होगा ....नो, नॉट अगेन ......
जब से विश्वास टूटा है , दोस्तों पर से , दोस्ती पर से , किसी से हँस के बात करने को भी मन नहीं करता है | लगता है , हर कोई सिर्फ किसी मकसद से ही मिल रहा है , कोई मतलब है हर किसी के ..बात करने का .....
...या शायद मैं भी ऐसी ही तो नहीं हूँ? हो सकता है, बिलकुल हो सकता है , दूसरों की गलती देखने से पहले मुझे अपने गिरेबान में भी झांकना होगा | या शायद मैंने दोस्त ही ऐसे चुने हैं ... पता नहीं ...
पता है संसार में सबसे बड़ी ख़ुशी क्या है ? जब आप मन से किसी को अपना मित्र मानते हैं , किसी के साथ आप इतना जुड़ जाते हैं की पता ही नहीं चलता की बात करते करते कितनी देर हो गयी .... मज़े की बात तो ये है की आपको ये भी याद नहीं रहता की आपने बात क्या की पर हाँ , कुछ तो बात होगी जो इतने घंटे बीत गए ... जब आप अपना हर कार्य ये सोच कर करते हैं की - अरे , ये ड्रेस अगर आकांक्षा देखेगी तो कितना हँसेगी , नहीं इसे नहीं इसे खरीदूंगी , मुझे पता है उसका टेस्ट मुझसे अच्छा है, उसे ये ही अच्छा लगेगा, हाँ ये लेना चाहिए .... देखो न , अगर इस रोल में विश्वास देखगा तो सोचेगा मुझे एक्टिंग नहीं आती , मैं ये रोल नहीं करूंगी , मैं इस से अच्छा कर सकती हूँ ... और करूंगी ...
कितना अच्छा लगता है जब आप अपने आप को स्ट्रेच करते हैं क्योंकि आप कुछ प्रूव करना चाहते हैं , उन लोगों को जो मायने रखते हैं, आपके लिए ........
पता है संसार का सबसे बड़ा दुःख क्या है ? जब आप अपने उन्हीं मित्रों से दूर हो जाते हैं ..... मन से .... |
कुछ भी तो नहीं बदलता संसार में ... सब कुछ जैसा था, वैसे ही चलता है ..... पर आप बदल जाते हैं ... आपकी सोच बदल जाती है | फिर न वो विश्वास रहता है, न ही आकांक्षाएं .......... विवेक तो जैसे मर ही जाता है |
फिर कोई भूले बिसरे आपक उदास चेहरे पे जो पूछ ले की क्या हुआ तो बस इतना कहते बनता है की तबियत ख़राब हो गयी है , और क्या कह सकते हैं.... हर रिश्ते को यहाँ मुहर लगानी ज़रूरी है , फिर वो रिश्ता जो था , है नहीं , उसकी मौत का सदमा, किस तरह से इज़हार किया जा सकता है .... क्या बेवकूफी है ... ओफ्फो !
नए ईमेल के आइकन ने ध्यान फिर से खींच लिया |
"साधनाजी, आपको याद है , गत समारोह में मैं आपसे मिला था | आपने मुझे एक्टिंग के क्षेत्र में प्रयास करने को कहा | आज मैंने पहली बार स्टेज पर परफोर्म किया है | मेरे मित्रों ने मेरे इस प्रथम अभियान को बहुत सराहा | आपका बहुत धन्यवाद , जो आज मैंने अरसे बाद फिर से अपने पसंदीदा कार्य में कदम रखा !!!! "
अरे ! ये अंकुर पागल है क्या ? कहा न मैंने इसको मुझे इस से बात नहीं करनी है | कोई ज़बरदस्ती है ... इतने सारे ईमेल ... मुझे क्या है ... देने दो.... अपने आप बंद हो जायेगा ......
अंकुर की ईमेल में मुझे अपना अतीत दिखता है | हाँ ... वही भाव जो मेरे थे , कुछ समय पहले ... वही भोलापन, वही निश्चलता , वही भाषा का प्रवाह, बिना रुके बोलते जाने की दौड़ , बिना किसीकी सुने बस अपने कहते रहने की चाह ..... हर नयी मुलाक़ात से एक नयी दोस्ती की आशा , सच अंकुर बिलकुल मेरे जैसा है ... या शायद मैं उसके जैसी थी ....
पर अब मैं संभल गयी हूँ ... समझ गयी हूँ ....... रिश्तों में इतनी दुनियादारी देख चुकी हूँ की अब दुनियादारी पर ही रिश्तेदारी निभा रही हूँ | अब अंकुर को जवाब देना उसका हौसला बढ़ाना होगा.... गलत होगा |
लेकिन, एक मिनट ... रुको...
पर ये एक मौका भी है कई बातों को झूठ साबित करने का | है नहीं क्या?
मैंने जितनी दोस्ती की , गलत साबित हुई .... पर मैंने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी की ... फिर हुआ क्या ? मन में विश्वास की जगह ये छि : भावना कैसे आ गयी ? हर बात पर मैंने पहल की, शिकायत का कभी मौका नहीं दिया पर हर बार धोखा ही देखा , हर जगह स्वार्थ जीत गया , और मेरा विश्वास हार गया |
पर हर किसी के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए | अंकुर वो है .... जो मैं थी, इश्वर उसके विश्वास को बनाए रखे ... उसके साथ मेरे जैसा व्यवहार ना हो....उसका दोस्ती पर से भरोसा नहीं उठाना चाहिए ... और मैं शायद उसमे उसकी मदद कर सकती हूँ ... कम से कम कोशिश कर सकती हूँ ... की उसका हौसला बना रहे ... मैं उसे जानती नहीं हूँ . ..... पर इतना जानती हूँ की उसमे बहुत काबिलियत है... बहुत जोश है ... एक दिन कुछ बन ने की क्षमता रखता है... बशर्ते उसका मनोबल न टूटे |
हाथ स्वतः ईमेल का जवाब लिखने लगे-
अंकुर, पहली सफलता पर बहुत बहुत बधाई ! ऑडिशन पर ही मुझे पता चल गया था की तुम्हारा स्टेज पर अच्छा नियंत्रण है | बस अब अपने काम में लग जाओ और निरंतर आगे बढ़ते रहो |
शुभकामनाओं सहित,
साधना
सेंड का बटन दबाते ही एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी | कितनी अजीब बात है न , किसी को ख़ुशी देने से खुद को भी कितना अच्छा लगता है |
सच विश्वास , आकांक्षा और विवेक , तुम लोगों की आज बहुत याद आ रही है ... दिल कर रहा है तुम सब के साथ अपनी नयी ख़ुशी बांटने का... लेकिन तुम सब अब बहुत आगे की सोचने लगे हो ... बहुत तेज़ भागने लगे हो ... लेकिन पता है क्या कहते हैं ... चूहे की दौड़ में तुम कहीं भी रहो, आखिर चूहे ही रहोगे , है न.... दोस्तों, एक बार इंसान बन कर देखो तो सही .... तुम मुझे वहीँ खडा पाओगे जहाँ से हम अलग रस्ते गए थे ....
चलो, तुम्हें तुम्हारी दौड़ मुबारक हो ...
अल दी बेस्ट !
पर फिर से बंद कर दिया .. नहीं , क्या फायदा ...फिर से वही होगा ....नो, नॉट अगेन ......
जब से विश्वास टूटा है , दोस्तों पर से , दोस्ती पर से , किसी से हँस के बात करने को भी मन नहीं करता है | लगता है , हर कोई सिर्फ किसी मकसद से ही मिल रहा है , कोई मतलब है हर किसी के ..बात करने का .....
...या शायद मैं भी ऐसी ही तो नहीं हूँ? हो सकता है, बिलकुल हो सकता है , दूसरों की गलती देखने से पहले मुझे अपने गिरेबान में भी झांकना होगा | या शायद मैंने दोस्त ही ऐसे चुने हैं ... पता नहीं ...
पता है संसार में सबसे बड़ी ख़ुशी क्या है ? जब आप मन से किसी को अपना मित्र मानते हैं , किसी के साथ आप इतना जुड़ जाते हैं की पता ही नहीं चलता की बात करते करते कितनी देर हो गयी .... मज़े की बात तो ये है की आपको ये भी याद नहीं रहता की आपने बात क्या की पर हाँ , कुछ तो बात होगी जो इतने घंटे बीत गए ... जब आप अपना हर कार्य ये सोच कर करते हैं की - अरे , ये ड्रेस अगर आकांक्षा देखेगी तो कितना हँसेगी , नहीं इसे नहीं इसे खरीदूंगी , मुझे पता है उसका टेस्ट मुझसे अच्छा है, उसे ये ही अच्छा लगेगा, हाँ ये लेना चाहिए .... देखो न , अगर इस रोल में विश्वास देखगा तो सोचेगा मुझे एक्टिंग नहीं आती , मैं ये रोल नहीं करूंगी , मैं इस से अच्छा कर सकती हूँ ... और करूंगी ...
कितना अच्छा लगता है जब आप अपने आप को स्ट्रेच करते हैं क्योंकि आप कुछ प्रूव करना चाहते हैं , उन लोगों को जो मायने रखते हैं, आपके लिए ........
पता है संसार का सबसे बड़ा दुःख क्या है ? जब आप अपने उन्हीं मित्रों से दूर हो जाते हैं ..... मन से .... |
कुछ भी तो नहीं बदलता संसार में ... सब कुछ जैसा था, वैसे ही चलता है ..... पर आप बदल जाते हैं ... आपकी सोच बदल जाती है | फिर न वो विश्वास रहता है, न ही आकांक्षाएं .......... विवेक तो जैसे मर ही जाता है |
फिर कोई भूले बिसरे आपक उदास चेहरे पे जो पूछ ले की क्या हुआ तो बस इतना कहते बनता है की तबियत ख़राब हो गयी है , और क्या कह सकते हैं.... हर रिश्ते को यहाँ मुहर लगानी ज़रूरी है , फिर वो रिश्ता जो था , है नहीं , उसकी मौत का सदमा, किस तरह से इज़हार किया जा सकता है .... क्या बेवकूफी है ... ओफ्फो !
नए ईमेल के आइकन ने ध्यान फिर से खींच लिया |
"साधनाजी, आपको याद है , गत समारोह में मैं आपसे मिला था | आपने मुझे एक्टिंग के क्षेत्र में प्रयास करने को कहा | आज मैंने पहली बार स्टेज पर परफोर्म किया है | मेरे मित्रों ने मेरे इस प्रथम अभियान को बहुत सराहा | आपका बहुत धन्यवाद , जो आज मैंने अरसे बाद फिर से अपने पसंदीदा कार्य में कदम रखा !!!! "
अरे ! ये अंकुर पागल है क्या ? कहा न मैंने इसको मुझे इस से बात नहीं करनी है | कोई ज़बरदस्ती है ... इतने सारे ईमेल ... मुझे क्या है ... देने दो.... अपने आप बंद हो जायेगा ......
अंकुर की ईमेल में मुझे अपना अतीत दिखता है | हाँ ... वही भाव जो मेरे थे , कुछ समय पहले ... वही भोलापन, वही निश्चलता , वही भाषा का प्रवाह, बिना रुके बोलते जाने की दौड़ , बिना किसीकी सुने बस अपने कहते रहने की चाह ..... हर नयी मुलाक़ात से एक नयी दोस्ती की आशा , सच अंकुर बिलकुल मेरे जैसा है ... या शायद मैं उसके जैसी थी ....
पर अब मैं संभल गयी हूँ ... समझ गयी हूँ ....... रिश्तों में इतनी दुनियादारी देख चुकी हूँ की अब दुनियादारी पर ही रिश्तेदारी निभा रही हूँ | अब अंकुर को जवाब देना उसका हौसला बढ़ाना होगा.... गलत होगा |
लेकिन, एक मिनट ... रुको...
पर ये एक मौका भी है कई बातों को झूठ साबित करने का | है नहीं क्या?
मैंने जितनी दोस्ती की , गलत साबित हुई .... पर मैंने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी की ... फिर हुआ क्या ? मन में विश्वास की जगह ये छि : भावना कैसे आ गयी ? हर बात पर मैंने पहल की, शिकायत का कभी मौका नहीं दिया पर हर बार धोखा ही देखा , हर जगह स्वार्थ जीत गया , और मेरा विश्वास हार गया |
पर हर किसी के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए | अंकुर वो है .... जो मैं थी, इश्वर उसके विश्वास को बनाए रखे ... उसके साथ मेरे जैसा व्यवहार ना हो....उसका दोस्ती पर से भरोसा नहीं उठाना चाहिए ... और मैं शायद उसमे उसकी मदद कर सकती हूँ ... कम से कम कोशिश कर सकती हूँ ... की उसका हौसला बना रहे ... मैं उसे जानती नहीं हूँ . ..... पर इतना जानती हूँ की उसमे बहुत काबिलियत है... बहुत जोश है ... एक दिन कुछ बन ने की क्षमता रखता है... बशर्ते उसका मनोबल न टूटे |
हाथ स्वतः ईमेल का जवाब लिखने लगे-
अंकुर, पहली सफलता पर बहुत बहुत बधाई ! ऑडिशन पर ही मुझे पता चल गया था की तुम्हारा स्टेज पर अच्छा नियंत्रण है | बस अब अपने काम में लग जाओ और निरंतर आगे बढ़ते रहो |
शुभकामनाओं सहित,
साधना
सेंड का बटन दबाते ही एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी | कितनी अजीब बात है न , किसी को ख़ुशी देने से खुद को भी कितना अच्छा लगता है |
सच विश्वास , आकांक्षा और विवेक , तुम लोगों की आज बहुत याद आ रही है ... दिल कर रहा है तुम सब के साथ अपनी नयी ख़ुशी बांटने का... लेकिन तुम सब अब बहुत आगे की सोचने लगे हो ... बहुत तेज़ भागने लगे हो ... लेकिन पता है क्या कहते हैं ... चूहे की दौड़ में तुम कहीं भी रहो, आखिर चूहे ही रहोगे , है न.... दोस्तों, एक बार इंसान बन कर देखो तो सही .... तुम मुझे वहीँ खडा पाओगे जहाँ से हम अलग रस्ते गए थे ....
चलो, तुम्हें तुम्हारी दौड़ मुबारक हो ...
अल दी बेस्ट !
Tuesday, March 24, 2009
नाम का इनाम !
साधना को रात भर नींद नहीं आई थी |
आज उसे देश का सबसे बड़ा सम्मान जो मिलने वाला था - फिल्म जगत की सबसे मशहूर अदाकारा होने का | ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता |
ख़ुशी तो थी ही पर एक तरह का डर भी था - क्या होगा, कैसे होगा, कुछ गड़बड़ न हो जाए | चलो देखी जायेगी |
ट्रोफी हाथ में लेकर वो सबसे पहले अपने दोस्तों के पास जायेगी | उसके दोस्त बहुत ही गिने चुने हैं - पर बहुत क्लोज़ है उनसे | एक रिश्ता सा बांध गया था इन तीनों के साथ - विश्वास, विवेक और आकांक्षा | तीनों ही अलग अलग तरह से उस से परिचित हैं | आकांक्षा बचपन की सहेली है तो विवेक कॉलेज का दोस्त| विश्वास से पहचान तो एक्टिंग के सिलिसिले में ही हुई थी |
आज का दिन बहुत लम्बा लग रहा था | इंतजार था की कब शाम हो और वो घडी आये जिसमे उसके सारे सपने सच हों | आज तक शादी को टालती आई है ताकी कुछ बन जाए तो फिर शान से अपनी गृहस्ती बसाए |
उसका हाथ बढा की आकांक्षा से बात करे और अपनी ख़ुशी और डर दोनों के बारे में बताये | नहीं नहीं , शायद उसे लगेगा की शो ऑफ़ कर रही है | उसे पता तो चलेगा ही , चलो उसे ही कॉल करने दो | फिर देर तक बात करूंगी ....
बाथरूम से निकली ही थी की सेल फोन का गीत बज उठा | टोन फ्रेंड का था सो उसने उठाया | सोचा शायद आकांक्षा का होगा - विश्वास का था |
"मुबारकें , मैंने सुना बड़ी स्टार बन गयी हो | मुझे पता था की एक दिन तुम नाम करोगी | बहुत बधाई !" एक अरसे बाद विश्वास की आवाज़ सुन कर साधना को बहुत आश्चर्य हो रहा था | जब दोनों एक ही मूवी में काम कर रहे थे तो बहुत ही अच्छी दोस्ती हो गयी थी | लेकिन विश्वास की दोस्ती के मायने और मापदंड साधना से अलग थे | सो कुछ समय की दोस्ती के बाद वे अलग रस्ते चले गए थे |
"शुक्रिया ,आपने फोन किया , बहुत ख़ुशी हुई | समारोह में आ पाएंगे ?" साधना ने सवाल किया |
"नहीं, समय थोडा कम है | आ नहीं पाऊँगा | पर मैंने तुम्हें याद दिलाने के लिए कॉल किया है की आज जब तुम्हें अवार्ड मिले तो थेंक यू लिस्ट में मेरा नाम लेना मत भूलना | याद है , तुमने कहा था की तुम्हारी सफलता की सीढी मुझसे शुरू हुई थी ...मैंने ही तुम्हें उस डिरेक्टर से मिलाया था जिसके साथ तुम्हें ये अवार्ड दिया जा रहा है | " विश्वास की बात पर साधना को विश्वास नहीं हो रहा था |
"आपकी इंट्रो को मैं पहले ही एक्नोलेज कर चुकी हूँ | और इसके सिवा मैं आपके लिए कुछ नहीं कहना चाहती ..." साधना कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर कुछ सोच कर रुक सी गयी | कई सवाल थे जिनके जवाब मांगने बाकी थे , कई आंसू थे जिनकी वजह अभी तक साफ़ नहीं थे | और आज इतने दिनों बाद सिर्फ ... इसीलिए फोन किया गया था की समाज में नाम ..
"छी: ....सच , जो सुना ... अभी तक कानों को यकीन नहीं हो रहा है .... इश्वर जो करता है , अच्छा होता है | शुकर है ऐसे मित्र से मित्र का न होना बेहतर है | जस्ट फोगेट ईट ... " साधना खुद को दिलासा देना चाह रही थी पर जैसे रह रह कर एक प्रश्न काट रहा था - "कोई ऐसा कह कैसे सकता है ? आई मीन ... ...हद है !"
सुबह सुबह ही मूड ख़राब सा हो गया |
न चाहते हुए भी हाथ फोन तक पहुँच गए | नंबर आकांक्षा का घुमाया | उधर से एक पहचानी आवाज़ सुनकर बहुत ख़ुशी हुई |
"हाई मैडम , किसी मीटिंग में हो क्या ? बड़ी आवाज़ आ रही है पीछे से | " साधना ने पूछा |
"ओ नो, मैं और ऋषभ लॉस वेगास आये हैं , शोर उसी का है |" बड़ी अलसाई आवाज़ से जवाब आया | लग रहा था की मय और मस्ती खूब जोर मार था |
"अरे , तुम आज शाम समारोह में नहीं आ रही हो क्या? ये क्या बात .." गुस्से से साधना बोली |
"ओह्हो , यार मैं तो भूल ही गयी | तेरी अवार्ड सेरीमनी आज है ? ओह माई गोड | अब तो देर हो गयी | शीट, मेरा तो लॉस हो गया" , आकांक्षा परेशान लग रही थी |
"चल कोई बात नहीं , टी वी पर आयेगा सात बजे , ज़रूर देखना | "साधना ने दुखी होकर कहा |
"नो मेन ! बात तुम्हारे शो की नहीं है , मुझे राठोड जी से मिलना था | उनसे मेरी बात हुई थी उनके कंपनी प्रोजेक्ट के बारे में, और कहीं उनसे मिलना मुश्किल होता है | पर वो तुम्हारे बड़े फेन हैं | इवेंट में ज़रूर आएंगे | अरे यार, प्लीज़ , डू मी अ फ़ेवोर | प्लीज़ उनसे कह देना की प्रोजेक्ट मुझे ही दें.....प्लीज़ साधना ..... देखो प्रोजेक्ट का १० % मैं तुम्हें दे दूँगी| अब खुश ... कर दोगी न .... जस्ट से येस ! ... " आकांक्षा बड़े ही अधिकार से कहती है , चाहे जो कहे |
"आकांक्षा , राठोड जी नियत के साफ़ इंसान नहीं हैं | अगर मेरी मानो तो उनसे दूर रहो और मुझे भी उनसे मिलने को मत कहो | आकांक्षा ...." साधना बात पूरी भी नहीं कर पाई थी की आकांक्षा चीख उठी |
"तुम्हें कुछ नहीं करना स्वीटी , बस हें हें फें फें कर दो ज़रा सा और कह दो मेरा नाम .. वो समझ जायेंगे " आकांक्षा हंसते हुए बोली |
"पर तुम कब समझोगी आकांक्षा .... आई विश यु कुड .....! " साधना को लगा अगर थोडी देर और फ़ोन को पकड़ी रही तो फ़ोन पर ही रो देगी | इसीलिए जल्दी से कुछ बहाना बना कर फ़ोन काट दिया उसने |
"आज दिन ही ख़राब है , किसी का कोई दोष नहीं है | खैर, कोई बात नहीं ....."
शाम को चार बजे, अपने निर्धारित समय से ब्यूटी पार्लोर की लड़की आ गई थी साधना को सजाने के लिए |
कृत्रिम लिपा पुती, ये शो शे बाज़ी , ये तेज़ रौशनी , ये लायिम लाइट -- जीवन के अंधेरे को शायद थोडी देर के लिए ढक देते हैं , पर उसके बाद ...
शो शुरू होने में कुछ ही देर बाकी था | साधना को अभी तक यूँ लग रहा था की उसके दोस्त मजाक कर रहे हैं और अन्तिम क्षण में आकर उसे चौंका देंगे जैसे बच्चे करते हैं - देखो, सरप्रयिज़ ! हम सब आ गए |
फिर साधना कितनी खुश हो जायेगी और सब भूल जायेगी |
सोचते सोचते सेल फ़ोन पर SMS का आइकन देख कर ठिठक गई |
उसे पता था | विवेक का होगा | शायद देर हो गई उसे आने में और उसकी माफ़ी मांग रहा है | घर परिवार वाला बंदा है | देर तो लग ही जाती है | चलो, माफ़ कर दूँगी | मंजुला भी साथ आ रही होगी शायद ! बहुत अच्छी बात है |
उसने SMS पढ़ा , फिर सेल फ़ोन ऑफ़ कर दिया |
साधना का नाम माइक पर दुबारा पुकारा गया |
किसी ने साधना को ध्यान दिलाया की जाओ साधना , तुम्हें बुला रहे हैं | तालियों से हॉल गूँज रहा था |
साधना के ज़ेहन में SMS के शब्द घूम रहे थे |
"साधना, आज शो में आ नहीं पाएंगे। ऑफिस में ज़रूरी काम आ गया है | और हाँ, एक रेकुएस्ट है | तुम्हारा सौंड सिस्टम चाहिए एक दिन के लिए | मैं ही आ के ले जाऊंगा | तुम रामू को बता देना| आज तुम्हारे लिए कितने लोग ताली बजायेंगे | तुम्हारे कितने नए फ्रेंड्स बनेंगे , फिर पुराने फ्रेंड्स को मत भूल जाना ... "
साधना ट्रोफी हाथ में लेकर खड़ी थी | मंद मंद मुस्कुरा रही थी | अब वाकई उसे एक्टिंग करना आ गया था|
ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता ......
आज उसे देश का सबसे बड़ा सम्मान जो मिलने वाला था - फिल्म जगत की सबसे मशहूर अदाकारा होने का | ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता |
ख़ुशी तो थी ही पर एक तरह का डर भी था - क्या होगा, कैसे होगा, कुछ गड़बड़ न हो जाए | चलो देखी जायेगी |
ट्रोफी हाथ में लेकर वो सबसे पहले अपने दोस्तों के पास जायेगी | उसके दोस्त बहुत ही गिने चुने हैं - पर बहुत क्लोज़ है उनसे | एक रिश्ता सा बांध गया था इन तीनों के साथ - विश्वास, विवेक और आकांक्षा | तीनों ही अलग अलग तरह से उस से परिचित हैं | आकांक्षा बचपन की सहेली है तो विवेक कॉलेज का दोस्त| विश्वास से पहचान तो एक्टिंग के सिलिसिले में ही हुई थी |
आज का दिन बहुत लम्बा लग रहा था | इंतजार था की कब शाम हो और वो घडी आये जिसमे उसके सारे सपने सच हों | आज तक शादी को टालती आई है ताकी कुछ बन जाए तो फिर शान से अपनी गृहस्ती बसाए |
उसका हाथ बढा की आकांक्षा से बात करे और अपनी ख़ुशी और डर दोनों के बारे में बताये | नहीं नहीं , शायद उसे लगेगा की शो ऑफ़ कर रही है | उसे पता तो चलेगा ही , चलो उसे ही कॉल करने दो | फिर देर तक बात करूंगी ....
बाथरूम से निकली ही थी की सेल फोन का गीत बज उठा | टोन फ्रेंड का था सो उसने उठाया | सोचा शायद आकांक्षा का होगा - विश्वास का था |
"मुबारकें , मैंने सुना बड़ी स्टार बन गयी हो | मुझे पता था की एक दिन तुम नाम करोगी | बहुत बधाई !" एक अरसे बाद विश्वास की आवाज़ सुन कर साधना को बहुत आश्चर्य हो रहा था | जब दोनों एक ही मूवी में काम कर रहे थे तो बहुत ही अच्छी दोस्ती हो गयी थी | लेकिन विश्वास की दोस्ती के मायने और मापदंड साधना से अलग थे | सो कुछ समय की दोस्ती के बाद वे अलग रस्ते चले गए थे |
"शुक्रिया ,आपने फोन किया , बहुत ख़ुशी हुई | समारोह में आ पाएंगे ?" साधना ने सवाल किया |
"नहीं, समय थोडा कम है | आ नहीं पाऊँगा | पर मैंने तुम्हें याद दिलाने के लिए कॉल किया है की आज जब तुम्हें अवार्ड मिले तो थेंक यू लिस्ट में मेरा नाम लेना मत भूलना | याद है , तुमने कहा था की तुम्हारी सफलता की सीढी मुझसे शुरू हुई थी ...मैंने ही तुम्हें उस डिरेक्टर से मिलाया था जिसके साथ तुम्हें ये अवार्ड दिया जा रहा है | " विश्वास की बात पर साधना को विश्वास नहीं हो रहा था |
"आपकी इंट्रो को मैं पहले ही एक्नोलेज कर चुकी हूँ | और इसके सिवा मैं आपके लिए कुछ नहीं कहना चाहती ..." साधना कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर कुछ सोच कर रुक सी गयी | कई सवाल थे जिनके जवाब मांगने बाकी थे , कई आंसू थे जिनकी वजह अभी तक साफ़ नहीं थे | और आज इतने दिनों बाद सिर्फ ... इसीलिए फोन किया गया था की समाज में नाम ..
"छी: ....सच , जो सुना ... अभी तक कानों को यकीन नहीं हो रहा है .... इश्वर जो करता है , अच्छा होता है | शुकर है ऐसे मित्र से मित्र का न होना बेहतर है | जस्ट फोगेट ईट ... " साधना खुद को दिलासा देना चाह रही थी पर जैसे रह रह कर एक प्रश्न काट रहा था - "कोई ऐसा कह कैसे सकता है ? आई मीन ... ...हद है !"
सुबह सुबह ही मूड ख़राब सा हो गया |
न चाहते हुए भी हाथ फोन तक पहुँच गए | नंबर आकांक्षा का घुमाया | उधर से एक पहचानी आवाज़ सुनकर बहुत ख़ुशी हुई |
"हाई मैडम , किसी मीटिंग में हो क्या ? बड़ी आवाज़ आ रही है पीछे से | " साधना ने पूछा |
"ओ नो, मैं और ऋषभ लॉस वेगास आये हैं , शोर उसी का है |" बड़ी अलसाई आवाज़ से जवाब आया | लग रहा था की मय और मस्ती खूब जोर मार था |
"अरे , तुम आज शाम समारोह में नहीं आ रही हो क्या? ये क्या बात .." गुस्से से साधना बोली |
"ओह्हो , यार मैं तो भूल ही गयी | तेरी अवार्ड सेरीमनी आज है ? ओह माई गोड | अब तो देर हो गयी | शीट, मेरा तो लॉस हो गया" , आकांक्षा परेशान लग रही थी |
"चल कोई बात नहीं , टी वी पर आयेगा सात बजे , ज़रूर देखना | "साधना ने दुखी होकर कहा |
"नो मेन ! बात तुम्हारे शो की नहीं है , मुझे राठोड जी से मिलना था | उनसे मेरी बात हुई थी उनके कंपनी प्रोजेक्ट के बारे में, और कहीं उनसे मिलना मुश्किल होता है | पर वो तुम्हारे बड़े फेन हैं | इवेंट में ज़रूर आएंगे | अरे यार, प्लीज़ , डू मी अ फ़ेवोर | प्लीज़ उनसे कह देना की प्रोजेक्ट मुझे ही दें.....प्लीज़ साधना ..... देखो प्रोजेक्ट का १० % मैं तुम्हें दे दूँगी| अब खुश ... कर दोगी न .... जस्ट से येस ! ... " आकांक्षा बड़े ही अधिकार से कहती है , चाहे जो कहे |
"आकांक्षा , राठोड जी नियत के साफ़ इंसान नहीं हैं | अगर मेरी मानो तो उनसे दूर रहो और मुझे भी उनसे मिलने को मत कहो | आकांक्षा ...." साधना बात पूरी भी नहीं कर पाई थी की आकांक्षा चीख उठी |
"तुम्हें कुछ नहीं करना स्वीटी , बस हें हें फें फें कर दो ज़रा सा और कह दो मेरा नाम .. वो समझ जायेंगे " आकांक्षा हंसते हुए बोली |
"पर तुम कब समझोगी आकांक्षा .... आई विश यु कुड .....! " साधना को लगा अगर थोडी देर और फ़ोन को पकड़ी रही तो फ़ोन पर ही रो देगी | इसीलिए जल्दी से कुछ बहाना बना कर फ़ोन काट दिया उसने |
"आज दिन ही ख़राब है , किसी का कोई दोष नहीं है | खैर, कोई बात नहीं ....."
शाम को चार बजे, अपने निर्धारित समय से ब्यूटी पार्लोर की लड़की आ गई थी साधना को सजाने के लिए |
कृत्रिम लिपा पुती, ये शो शे बाज़ी , ये तेज़ रौशनी , ये लायिम लाइट -- जीवन के अंधेरे को शायद थोडी देर के लिए ढक देते हैं , पर उसके बाद ...
शो शुरू होने में कुछ ही देर बाकी था | साधना को अभी तक यूँ लग रहा था की उसके दोस्त मजाक कर रहे हैं और अन्तिम क्षण में आकर उसे चौंका देंगे जैसे बच्चे करते हैं - देखो, सरप्रयिज़ ! हम सब आ गए |
फिर साधना कितनी खुश हो जायेगी और सब भूल जायेगी |
सोचते सोचते सेल फ़ोन पर SMS का आइकन देख कर ठिठक गई |
उसे पता था | विवेक का होगा | शायद देर हो गई उसे आने में और उसकी माफ़ी मांग रहा है | घर परिवार वाला बंदा है | देर तो लग ही जाती है | चलो, माफ़ कर दूँगी | मंजुला भी साथ आ रही होगी शायद ! बहुत अच्छी बात है |
उसने SMS पढ़ा , फिर सेल फ़ोन ऑफ़ कर दिया |
साधना का नाम माइक पर दुबारा पुकारा गया |
किसी ने साधना को ध्यान दिलाया की जाओ साधना , तुम्हें बुला रहे हैं | तालियों से हॉल गूँज रहा था |
साधना के ज़ेहन में SMS के शब्द घूम रहे थे |
"साधना, आज शो में आ नहीं पाएंगे। ऑफिस में ज़रूरी काम आ गया है | और हाँ, एक रेकुएस्ट है | तुम्हारा सौंड सिस्टम चाहिए एक दिन के लिए | मैं ही आ के ले जाऊंगा | तुम रामू को बता देना| आज तुम्हारे लिए कितने लोग ताली बजायेंगे | तुम्हारे कितने नए फ्रेंड्स बनेंगे , फिर पुराने फ्रेंड्स को मत भूल जाना ... "
साधना ट्रोफी हाथ में लेकर खड़ी थी | मंद मंद मुस्कुरा रही थी | अब वाकई उसे एक्टिंग करना आ गया था|
ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता ......
Tuesday, December 16, 2008
दिल का हाल सुने दिलवाला....
तन्मय सीरीज़ पार्ट ३
"तन्मय, तुमसे बड़ा ईडिअट मैंने आज तक नहीं देखा | विश्वास नहीं होता की तुम ऐसा कर सकते हो| क्यों तन्मय ? क्यों किया ऐसा तुमने ?" गुस्से में सुजाता कुछ भी कह रही थी |
"कम ओन, इसमे इतनी बड़ी बात क्या है ? " बड़ी सरलता से तन्मय ने कहा|
"बड़ी बात क्या है? ये तुम कह रहे हो | याद है तुम ही ने मुझे इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया था | मैं जानती हूँ तन्मय की इसके साथ क्या कुछ जुडा था तुम्हारा | इतना बड़ा प्रोजेक्ट फ़ेल हो गया तन्मय और तुमने मुझे बताया ही नहीं | मैं समझती थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते हो| तुमने इस काबिल भी नहीं समझा की अपनी बात खुल कर बता सको | छिः ! और ऊपर से मुझे ये कहा की सब मस्त हो गया | ये मस्त हुआ है? हाँ ?" सुजाता जाने क्यों इतना भड़क रही थी |
"तुम्हें किसने बताया ?" सवाल सीधा था|
"अरे इतनी भी डम्बो नहीं हूँ मैं | हाँ , हाय लेवल पर नहीं हूँ पर ग्रुप में तो हूँ | क्या समझे ? तुम नहीं बताओगे तो मुझे पता नहीं चलेगा? अब समझी मैं, क्यों इतने दिनों से मेरे सामने आते कतराते थे | एक पल में ही पराया कर दिया, नहीं क्या?" अब गुस्सा कम होते होते स्वर में उदासीनता झलक रही थी | और दरअसल गम और गुस्से का फर्क ज़्यादा होता भी नहीं है | कब क्या कौन सा रूप ले ले पता नहीं चलता |
"नहीं मैं तुम्हे भी दुखी नहीं करना चाहता था | जो हुआ सो हुआ | अब क्या कर सकते हैं ? तुम अभी अभी आई हो | और तुमने इतनी मेहनत की थी उस प्रोजेक्ट में, तुम्हें निराशा नहीं दिखनी चाहिए नहीं तो तुम्हारा मोरल डाउन हो जाएगा | " मुस्कुराते हुए तन्मय ने कहा |
"पर तुम ऐसा किस तरह कर पाये | इतना सब कुछ हो गया और तुम हँसते रहे | और तो और, तुमने मुझसे जगह भी पूछी जहाँ मंजुला को ले के जा सको | मैं समझी वाकई सब सही है | आई ऍम सो डम्ब ना !" माथे पर हाथ रखते हुए सुजाता ने कहा |
"ईडिअट! तुम्हारा बर्डे था उस दिन,पर बहुत देर हो गई थी | तुम्हारा ट्रीट भी देना है | उस दिन तो नहीं जा सके पर ये जानना चाहता था की किस जगह तुम्हें अच्छा लगता है | ताकि फिर कभी जा सकें | चलें आज, फ्रेश चोइस ? "खिलखिलाते हुए तन्मय ने कहा |
"शट अप्! मुझे अच्छी तरह से पता है की तुम किस दौर से गुज़र रहे हो | और ज़्यादा एक्टिंग मत करो | चलो वाक कर के आते हैं | और मुझे बताओ की ऐसा कैसे हुआ ? सब तो सही लग रहा था | एकदम सब फ़ेल कैसे हो गया ? " डांट ते हुए सुजाता ने कहा |
तन्मय ने वाक के दौरान सब विस्तार में बताया की किस तरह उसके कुछ प्रतिद्वंदियों ने कपट से उसका प्रोजेक्ट फ़ेल किया है , हालाँकि प्रोजेक्ट के लॉन्च से सबका भला होता | पर यह ज़ाहिर था की इसकी नाकामयाबी पर तन्मय बहुत बदल गया था | खुशी का मुखौटा जो उसने ओढ़ रखा था , उसके उतरते ही वो बहुत ही दिप्रेस्स्ड और चुप सा दिखने लगा |
किसी हँसते खेलते दोस्त को मुरझाते देख अच्छा नहीं लगता |
"कोई बात नहीं तन्मय फिर से ट्राई करेंगे | ये सब तो चलता रहता है | बुरे वक्त के कारण ही अच्छे दौर की कदर होती है | और बड़ी बात ये है की अब तुम्हे दोस्त-दुश्मनों की पहचान भी हो गई ताकि तुम उनसे सावधान रह सको | " सुजाता अपनी नसीहतें देने में देर नहीं करती थी |
"मेरी माँ, अब बस करो | "हाथ जोड़ते हुए तन्मय बोला | पर हँसी अब भी गायब थी |
"ऐसे कैसे बस करुँ? ऐसे ही मौकों के लिए मेरे पास बहुत सारे फंडे हैं | सुनाऊं? " तन्मय को हँसाना ज़रूरी था |
"ऐसे हाथ को क्रॉस कर के क्यों खड़े हो जैसे की अभी मुझसे लड़ने वाले हो ..." सुजाता ने बात बदलनी चाहिए |
"अब क्या लडूंगा? जहाँ लड़ना था वहां तो कुछ नहीं कर पाया ... सुजाता , बात घूम फिर कर वहीँ आ जाती है | हम चाहे जितना भी , कुछ भी कर लें , पर ये आख़िर नौकरी ही है, और हम हैं - नौकर !" अब धीरे धीरे रोष निकल रहा था |
अच्छा है, गम और गुस्से में फर्क नहीं होता | और दोनों का निकल जाना हरियाली की ओर पहला क़दम है |
तन्मय की बात जैसे अभी शुरू ही हुई थी -"तुम मानोगी नहीं , पिछले एक साल से मैंने क्या नहीं किया है ? गधे की तरह, दिन रात , सब कुछ भूल कर , लगा हुआ हूँ, सब लोग जानते हैं की कैसे हमने इस प्रोडक्ट को स्टार्ट किया है | ऐसे कैसे सब भूल सकते हैं लोग ? पता है सुजाता , मेरा एक प्रॉब्लम है , मैं अपने काम की मार्केटिंग नहीं करता , शायद इसी वजह से ... | "
"नहीं तन्मय , सब लोग जानते हैं , अच्छे वर्कर को पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं होती| और हाँ , सब जानते हैं तुम्हारी काबिलियत को | तुम्हें किसीको कुछ प्रूव करने की ज़रूरत ही नहीं है | "बीच में ही सुजाता बोल उठी |
"पर अब बहुत हो गया | तमन्ना को जानती हो न, मेरी बॉस , उसको पता है मेरा काम, फिर भी अपने दोस्त को ही सप्पोर्ट करती है | ओके , अब बहुत हो गया | अब मैं आठ घंटे ही काम करूंगा | अब और नहीं ... न पैसे बढाते हैं, न प्रमोशन देते हैं... न प्रोजेक्ट लॉन्च करते हैं.... कोई करे तो क्या करे ! " तन्मय की आवाज़ अब बहुत दूर दूर तक सुनी जा सकती थी |
"तन्मय मुझे पता है ! टीम में ही अगर लोग गुट बनाकर पॉलिटिक्स करने लगें तो बहुत मुश्किल हो जाता है | पर तुम रीयाक्ट मत करो , रेस्पोंसिब्ली एक्ट करो | देखना सब ठीक हो जाएगा | इश्वर का शुक्र करो की इस ख़राब इकोनोमी में तुम्हारे पास एक जॉब है | पता है , मेरे पास एक बहुत बड़ी दवा है , इस सिचुअशन से लड़ने का | " सुजाता बोली|
"ऐसा क्या है , ज़रा हम भी तो सुनें ..."तन्मय ने फिर से हाथों को क्रॉस किया , जैसे की लड़ने की पूरी तयारी में हो!
"तुम्हारी गुडिया है न, मुझे पता है उसमे तुम्हारी जान है .." सुजाता ने धीरे से कहा ..
"हाँ , वो तो है ... पर तुम्हें कैसे पता ?" तन्मय को आश्चर्य हुआ |
"अरे, लो कर लो बात ....एनीवे... मैं कह रही थी की ... आज ही अपने रूम में उसकी एक फोटो ठीक चेहरे के सामने लगाओ और रोज़ अपनी डायरी में एक बात ऐसी लिखो जो उसने कही हो या की हो | देखना अपने आप सब भूल कर मन अच्छा हो जाएगा | दरअसल, जब हम जीवन की छोटी छोटी खुशियाँ भूल जाते हैं .. तो शायद जीवन भी हमें भूल जाता है | जीवन को फिर से अपने जीवन में लाओ तन्मय, सारेगामापा देखते हो? उसमे अस्मा कहती है न? .........." मुश्किल नहीं है "| है नहीं ..? " सुजाता की बात ख़तम होने से पहले ही तन्मय बोल पड़ा- "ओह माय गोड! शी इज सो क्यूट ! अरे यार , उस से पहले वो भी थी न, कौन थी वो ? माली नहीं मौली , माय गोड !, मैं मंजुला से कहता था - देखना ये लड़की जीतेगी ... मैया मैया..... क्या मस्त गाती थी मालूम .. "
सुजाता समझ गई थी की उसका दोस्त अब लौट आया है |
अब तन्मय हंस रहा था, बाकी सब बातें भूल के .. पुराने दिनों जैसे|
अब उसकी खुशी दिखावटी नहीं थी |
"तन्मय , याद है , कॉलेज में स्प्रिंग फेस्ट में हम सबने मिलकर एक गाना गाया था .. वो जो जीता वही सिकंदर से .. क्या था वो..." सुजाता याद करने की कोशिश करने लगी |
"अरे हाँ ! वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है .... टें टें टें टें टें .... अरे तुम भी गाओ न ... तुम भी तो ग्रुप में थी न ? याद नहीं है क्या ?" बड़ी मस्ती में तन्मय पूछ बैठा|
"चलो गाते हैं ..." सुजाता ने देख कर हँसते हुए कहा |
"वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना जिसे आता है ,
निकलेंगे मैदान में जिस दिन हम झूम के ,
धरती डोलेगी ये क़दम चूम के,"
"नहीं समझे हैं , वो हमें, तो क्या जाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना हमें आता है ".......................टें टें टें टें टें !
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"तन्मय, तुमसे बड़ा ईडिअट मैंने आज तक नहीं देखा | विश्वास नहीं होता की तुम ऐसा कर सकते हो| क्यों तन्मय ? क्यों किया ऐसा तुमने ?" गुस्से में सुजाता कुछ भी कह रही थी |
"कम ओन, इसमे इतनी बड़ी बात क्या है ? " बड़ी सरलता से तन्मय ने कहा|
"बड़ी बात क्या है? ये तुम कह रहे हो | याद है तुम ही ने मुझे इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया था | मैं जानती हूँ तन्मय की इसके साथ क्या कुछ जुडा था तुम्हारा | इतना बड़ा प्रोजेक्ट फ़ेल हो गया तन्मय और तुमने मुझे बताया ही नहीं | मैं समझती थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते हो| तुमने इस काबिल भी नहीं समझा की अपनी बात खुल कर बता सको | छिः ! और ऊपर से मुझे ये कहा की सब मस्त हो गया | ये मस्त हुआ है? हाँ ?" सुजाता जाने क्यों इतना भड़क रही थी |
"तुम्हें किसने बताया ?" सवाल सीधा था|
"अरे इतनी भी डम्बो नहीं हूँ मैं | हाँ , हाय लेवल पर नहीं हूँ पर ग्रुप में तो हूँ | क्या समझे ? तुम नहीं बताओगे तो मुझे पता नहीं चलेगा? अब समझी मैं, क्यों इतने दिनों से मेरे सामने आते कतराते थे | एक पल में ही पराया कर दिया, नहीं क्या?" अब गुस्सा कम होते होते स्वर में उदासीनता झलक रही थी | और दरअसल गम और गुस्से का फर्क ज़्यादा होता भी नहीं है | कब क्या कौन सा रूप ले ले पता नहीं चलता |
"नहीं मैं तुम्हे भी दुखी नहीं करना चाहता था | जो हुआ सो हुआ | अब क्या कर सकते हैं ? तुम अभी अभी आई हो | और तुमने इतनी मेहनत की थी उस प्रोजेक्ट में, तुम्हें निराशा नहीं दिखनी चाहिए नहीं तो तुम्हारा मोरल डाउन हो जाएगा | " मुस्कुराते हुए तन्मय ने कहा |
"पर तुम ऐसा किस तरह कर पाये | इतना सब कुछ हो गया और तुम हँसते रहे | और तो और, तुमने मुझसे जगह भी पूछी जहाँ मंजुला को ले के जा सको | मैं समझी वाकई सब सही है | आई ऍम सो डम्ब ना !" माथे पर हाथ रखते हुए सुजाता ने कहा |
"ईडिअट! तुम्हारा बर्डे था उस दिन,पर बहुत देर हो गई थी | तुम्हारा ट्रीट भी देना है | उस दिन तो नहीं जा सके पर ये जानना चाहता था की किस जगह तुम्हें अच्छा लगता है | ताकि फिर कभी जा सकें | चलें आज, फ्रेश चोइस ? "खिलखिलाते हुए तन्मय ने कहा |
"शट अप्! मुझे अच्छी तरह से पता है की तुम किस दौर से गुज़र रहे हो | और ज़्यादा एक्टिंग मत करो | चलो वाक कर के आते हैं | और मुझे बताओ की ऐसा कैसे हुआ ? सब तो सही लग रहा था | एकदम सब फ़ेल कैसे हो गया ? " डांट ते हुए सुजाता ने कहा |
तन्मय ने वाक के दौरान सब विस्तार में बताया की किस तरह उसके कुछ प्रतिद्वंदियों ने कपट से उसका प्रोजेक्ट फ़ेल किया है , हालाँकि प्रोजेक्ट के लॉन्च से सबका भला होता | पर यह ज़ाहिर था की इसकी नाकामयाबी पर तन्मय बहुत बदल गया था | खुशी का मुखौटा जो उसने ओढ़ रखा था , उसके उतरते ही वो बहुत ही दिप्रेस्स्ड और चुप सा दिखने लगा |
किसी हँसते खेलते दोस्त को मुरझाते देख अच्छा नहीं लगता |
"कोई बात नहीं तन्मय फिर से ट्राई करेंगे | ये सब तो चलता रहता है | बुरे वक्त के कारण ही अच्छे दौर की कदर होती है | और बड़ी बात ये है की अब तुम्हे दोस्त-दुश्मनों की पहचान भी हो गई ताकि तुम उनसे सावधान रह सको | " सुजाता अपनी नसीहतें देने में देर नहीं करती थी |
"मेरी माँ, अब बस करो | "हाथ जोड़ते हुए तन्मय बोला | पर हँसी अब भी गायब थी |
"ऐसे कैसे बस करुँ? ऐसे ही मौकों के लिए मेरे पास बहुत सारे फंडे हैं | सुनाऊं? " तन्मय को हँसाना ज़रूरी था |
"ऐसे हाथ को क्रॉस कर के क्यों खड़े हो जैसे की अभी मुझसे लड़ने वाले हो ..." सुजाता ने बात बदलनी चाहिए |
"अब क्या लडूंगा? जहाँ लड़ना था वहां तो कुछ नहीं कर पाया ... सुजाता , बात घूम फिर कर वहीँ आ जाती है | हम चाहे जितना भी , कुछ भी कर लें , पर ये आख़िर नौकरी ही है, और हम हैं - नौकर !" अब धीरे धीरे रोष निकल रहा था |
अच्छा है, गम और गुस्से में फर्क नहीं होता | और दोनों का निकल जाना हरियाली की ओर पहला क़दम है |
तन्मय की बात जैसे अभी शुरू ही हुई थी -"तुम मानोगी नहीं , पिछले एक साल से मैंने क्या नहीं किया है ? गधे की तरह, दिन रात , सब कुछ भूल कर , लगा हुआ हूँ, सब लोग जानते हैं की कैसे हमने इस प्रोडक्ट को स्टार्ट किया है | ऐसे कैसे सब भूल सकते हैं लोग ? पता है सुजाता , मेरा एक प्रॉब्लम है , मैं अपने काम की मार्केटिंग नहीं करता , शायद इसी वजह से ... | "
"नहीं तन्मय , सब लोग जानते हैं , अच्छे वर्कर को पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं होती| और हाँ , सब जानते हैं तुम्हारी काबिलियत को | तुम्हें किसीको कुछ प्रूव करने की ज़रूरत ही नहीं है | "बीच में ही सुजाता बोल उठी |
"पर अब बहुत हो गया | तमन्ना को जानती हो न, मेरी बॉस , उसको पता है मेरा काम, फिर भी अपने दोस्त को ही सप्पोर्ट करती है | ओके , अब बहुत हो गया | अब मैं आठ घंटे ही काम करूंगा | अब और नहीं ... न पैसे बढाते हैं, न प्रमोशन देते हैं... न प्रोजेक्ट लॉन्च करते हैं.... कोई करे तो क्या करे ! " तन्मय की आवाज़ अब बहुत दूर दूर तक सुनी जा सकती थी |
"तन्मय मुझे पता है ! टीम में ही अगर लोग गुट बनाकर पॉलिटिक्स करने लगें तो बहुत मुश्किल हो जाता है | पर तुम रीयाक्ट मत करो , रेस्पोंसिब्ली एक्ट करो | देखना सब ठीक हो जाएगा | इश्वर का शुक्र करो की इस ख़राब इकोनोमी में तुम्हारे पास एक जॉब है | पता है , मेरे पास एक बहुत बड़ी दवा है , इस सिचुअशन से लड़ने का | " सुजाता बोली|
"ऐसा क्या है , ज़रा हम भी तो सुनें ..."तन्मय ने फिर से हाथों को क्रॉस किया , जैसे की लड़ने की पूरी तयारी में हो!
"तुम्हारी गुडिया है न, मुझे पता है उसमे तुम्हारी जान है .." सुजाता ने धीरे से कहा ..
"हाँ , वो तो है ... पर तुम्हें कैसे पता ?" तन्मय को आश्चर्य हुआ |
"अरे, लो कर लो बात ....एनीवे... मैं कह रही थी की ... आज ही अपने रूम में उसकी एक फोटो ठीक चेहरे के सामने लगाओ और रोज़ अपनी डायरी में एक बात ऐसी लिखो जो उसने कही हो या की हो | देखना अपने आप सब भूल कर मन अच्छा हो जाएगा | दरअसल, जब हम जीवन की छोटी छोटी खुशियाँ भूल जाते हैं .. तो शायद जीवन भी हमें भूल जाता है | जीवन को फिर से अपने जीवन में लाओ तन्मय, सारेगामापा देखते हो? उसमे अस्मा कहती है न? .........." मुश्किल नहीं है "| है नहीं ..? " सुजाता की बात ख़तम होने से पहले ही तन्मय बोल पड़ा- "ओह माय गोड! शी इज सो क्यूट ! अरे यार , उस से पहले वो भी थी न, कौन थी वो ? माली नहीं मौली , माय गोड !, मैं मंजुला से कहता था - देखना ये लड़की जीतेगी ... मैया मैया..... क्या मस्त गाती थी मालूम .. "
सुजाता समझ गई थी की उसका दोस्त अब लौट आया है |
अब तन्मय हंस रहा था, बाकी सब बातें भूल के .. पुराने दिनों जैसे|
अब उसकी खुशी दिखावटी नहीं थी |
"तन्मय , याद है , कॉलेज में स्प्रिंग फेस्ट में हम सबने मिलकर एक गाना गाया था .. वो जो जीता वही सिकंदर से .. क्या था वो..." सुजाता याद करने की कोशिश करने लगी |
"अरे हाँ ! वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है .... टें टें टें टें टें .... अरे तुम भी गाओ न ... तुम भी तो ग्रुप में थी न ? याद नहीं है क्या ?" बड़ी मस्ती में तन्मय पूछ बैठा|
"चलो गाते हैं ..." सुजाता ने देख कर हँसते हुए कहा |
"वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना जिसे आता है ,
निकलेंगे मैदान में जिस दिन हम झूम के ,
धरती डोलेगी ये क़दम चूम के,"
"नहीं समझे हैं , वो हमें, तो क्या जाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना हमें आता है ".......................टें टें टें टें टें !
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