Friday, March 27, 2009

फूल भी हो दरमियाँ तो फासले हुए !

ईमेल दूसरी बार खोला .....सोच कर की शिष्टता के लिए ही सही , जवाब तो देना चाहिए |
पर फिर से बंद कर दिया .. नहीं , क्या फायदा ...फिर से वही होगा ....नो, नॉट अगेन ......

जब से विश्वास टूटा है , दोस्तों पर से , दोस्ती पर से , किसी से हँस के बात करने को भी मन नहीं करता है | लगता है , हर कोई सिर्फ किसी मकसद से ही मिल रहा है , कोई मतलब है हर किसी के ..बात करने का .....

...या शायद मैं भी ऐसी ही तो नहीं हूँ? हो सकता है, बिलकुल हो सकता है , दूसरों की गलती देखने से पहले मुझे अपने गिरेबान में भी झांकना होगा | या शायद मैंने दोस्त ही ऐसे चुने हैं ... पता नहीं ...

पता है संसार में सबसे बड़ी ख़ुशी क्या है ? जब आप मन से किसी को अपना मित्र मानते हैं , किसी के साथ आप इतना जुड़ जाते हैं की पता ही नहीं चलता की बात करते करते कितनी देर हो गयी .... मज़े की बात तो ये है की आपको ये भी याद नहीं रहता की आपने बात क्या की पर हाँ , कुछ तो बात होगी जो इतने घंटे बीत गए ... जब आप अपना हर कार्य ये सोच कर करते हैं की - अरे , ये ड्रेस अगर आकांक्षा देखेगी तो कितना हँसेगी , नहीं इसे नहीं इसे खरीदूंगी , मुझे पता है उसका टेस्ट मुझसे अच्छा है, उसे ये ही अच्छा लगेगा, हाँ ये लेना चाहिए .... देखो न , अगर इस रोल में विश्वास देखगा तो सोचेगा मुझे एक्टिंग नहीं आती , मैं ये रोल नहीं करूंगी , मैं इस से अच्छा कर सकती हूँ ... और करूंगी ...

कितना अच्छा लगता है जब आप अपने आप को स्ट्रेच करते हैं क्योंकि आप कुछ प्रूव करना चाहते हैं , उन लोगों को जो मायने रखते हैं, आपके लिए ........

पता है संसार का सबसे बड़ा दुःख क्या है ? जब आप अपने उन्हीं मित्रों से दूर हो जाते हैं ..... मन से .... |

कुछ भी तो नहीं बदलता संसार में ... सब कुछ जैसा था, वैसे ही चलता है ..... पर आप बदल जाते हैं ... आपकी सोच बदल जाती है | फिर न वो विश्वास रहता है, न ही आकांक्षाएं .......... विवेक तो जैसे मर ही जाता है |

फिर कोई भूले बिसरे आपक उदास चेहरे पे जो पूछ ले की क्या हुआ तो बस इतना कहते बनता है की तबियत ख़राब हो गयी है , और क्या कह सकते हैं.... हर रिश्ते को यहाँ मुहर लगानी ज़रूरी है , फिर वो रिश्ता जो था , है नहीं , उसकी मौत का सदमा, किस तरह से इज़हार किया जा सकता है .... क्या बेवकूफी है ... ओफ्फो !

नए ईमेल के आइकन ने ध्यान फिर से खींच लिया |

"साधनाजी, आपको याद है , गत समारोह में मैं आपसे मिला था | आपने मुझे एक्टिंग के क्षेत्र में प्रयास करने को कहा | आज मैंने पहली बार स्टेज पर परफोर्म किया है | मेरे मित्रों ने मेरे इस प्रथम अभियान को बहुत सराहा | आपका बहुत धन्यवाद , जो आज मैंने अरसे बाद फिर से अपने पसंदीदा कार्य में कदम रखा !!!! "

अरे ! ये अंकुर पागल है क्या ? कहा न मैंने इसको मुझे इस से बात नहीं करनी है | कोई ज़बरदस्ती है ... इतने सारे ईमेल ... मुझे क्या है ... देने दो.... अपने आप बंद हो जायेगा ......

अंकुर की ईमेल में मुझे अपना अतीत दिखता है | हाँ ... वही भाव जो मेरे थे , कुछ समय पहले ... वही भोलापन, वही निश्चलता , वही भाषा का प्रवाह, बिना रुके बोलते जाने की दौड़ , बिना किसीकी सुने बस अपने कहते रहने की चाह ..... हर नयी मुलाक़ात से एक नयी दोस्ती की आशा , सच अंकुर बिलकुल मेरे जैसा है ... या शायद मैं उसके जैसी थी ....

पर अब मैं संभल गयी हूँ ... समझ गयी हूँ ....... रिश्तों में इतनी दुनियादारी देख चुकी हूँ की अब दुनियादारी पर ही रिश्तेदारी निभा रही हूँ | अब अंकुर को जवाब देना उसका हौसला बढ़ाना होगा.... गलत होगा |

लेकिन, एक मिनट ... रुको...

पर ये एक मौका भी है कई बातों को झूठ साबित करने का | है नहीं क्या?

मैंने जितनी दोस्ती की , गलत साबित हुई .... पर मैंने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी की ... फिर हुआ क्या ? मन में विश्वास की जगह ये छि : भावना कैसे आ गयी ? हर बात पर मैंने पहल की, शिकायत का कभी मौका नहीं दिया पर हर बार धोखा ही देखा , हर जगह स्वार्थ जीत गया , और मेरा विश्वास हार गया |

पर हर किसी के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए | अंकुर वो है .... जो मैं थी, इश्वर उसके विश्वास को बनाए रखे ... उसके साथ मेरे जैसा व्यवहार ना हो....उसका दोस्ती पर से भरोसा नहीं उठाना चाहिए ... और मैं शायद उसमे उसकी मदद कर सकती हूँ ... कम से कम कोशिश कर सकती हूँ ... की उसका हौसला बना रहे ... मैं उसे जानती नहीं हूँ . ..... पर इतना जानती हूँ की उसमे बहुत काबिलियत है... बहुत जोश है ... एक दिन कुछ बन ने की क्षमता रखता है... बशर्ते उसका मनोबल न टूटे |

हाथ स्वतः ईमेल का जवाब लिखने लगे-
अंकुर, पहली सफलता पर बहुत बहुत बधाई ! ऑडिशन पर ही मुझे पता चल गया था की तुम्हारा स्टेज पर अच्छा नियंत्रण है | बस अब अपने काम में लग जाओ और निरंतर आगे बढ़ते रहो |
शुभकामनाओं सहित,
साधना

सेंड का बटन दबाते ही एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी | कितनी अजीब बात है न , किसी को ख़ुशी देने से खुद को भी कितना अच्छा लगता है |
सच विश्वास , आकांक्षा और विवेक , तुम लोगों की आज बहुत याद आ रही है ... दिल कर रहा है तुम सब के साथ अपनी नयी ख़ुशी बांटने का... लेकिन तुम सब अब बहुत आगे की सोचने लगे हो ... बहुत तेज़ भागने लगे हो ... लेकिन पता है क्या कहते हैं ... चूहे की दौड़ में तुम कहीं भी रहो, आखिर चूहे ही रहोगे , है न.... दोस्तों, एक बार इंसान बन कर देखो तो सही .... तुम मुझे वहीँ खडा पाओगे जहाँ से हम अलग रस्ते गए थे ....

चलो, तुम्हें तुम्हारी दौड़ मुबारक हो ...

अल दी बेस्ट !

Tuesday, March 24, 2009

नाम का इनाम !

साधना को रात भर नींद नहीं आई थी |
आज उसे देश का सबसे बड़ा सम्मान जो मिलने वाला था - फिल्म जगत की सबसे मशहूर अदाकारा होने का | ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता |

ख़ुशी तो थी ही पर एक तरह का डर भी था - क्या होगा, कैसे होगा, कुछ गड़बड़ न हो जाए | चलो देखी जायेगी |

ट्रोफी हाथ में लेकर वो सबसे पहले अपने दोस्तों के पास जायेगी | उसके दोस्त बहुत ही गिने चुने हैं - पर बहुत क्लोज़ है उनसे | एक रिश्ता सा बांध गया था इन तीनों के साथ - विश्वास, विवेक और आकांक्षा | तीनों ही अलग अलग तरह से उस से परिचित हैं | आकांक्षा बचपन की सहेली है तो विवेक कॉलेज का दोस्त| विश्वास से पहचान तो एक्टिंग के सिलिसिले में ही हुई थी |

आज का दिन बहुत लम्बा लग रहा था | इंतजार था की कब शाम हो और वो घडी आये जिसमे उसके सारे सपने सच हों | आज तक शादी को टालती आई है ताकी कुछ बन जाए तो फिर शान से अपनी गृहस्ती बसाए |

उसका हाथ बढा की आकांक्षा से बात करे और अपनी ख़ुशी और डर दोनों के बारे में बताये | नहीं नहीं , शायद उसे लगेगा की शो ऑफ़ कर रही है | उसे पता तो चलेगा ही , चलो उसे ही कॉल करने दो | फिर देर तक बात करूंगी ....

बाथरूम से निकली ही थी की सेल फोन का गीत बज उठा | टोन फ्रेंड का था सो उसने उठाया | सोचा शायद आकांक्षा का होगा - विश्वास का था |

"मुबारकें , मैंने सुना बड़ी स्टार बन गयी हो | मुझे पता था की एक दिन तुम नाम करोगी | बहुत बधाई !" एक अरसे बाद विश्वास की आवाज़ सुन कर साधना को बहुत आश्चर्य हो रहा था | जब दोनों एक ही मूवी में काम कर रहे थे तो बहुत ही अच्छी दोस्ती हो गयी थी | लेकिन विश्वास की दोस्ती के मायने और मापदंड साधना से अलग थे | सो कुछ समय की दोस्ती के बाद वे अलग रस्ते चले गए थे |
"शुक्रिया ,आपने फोन किया , बहुत ख़ुशी हुई | समारोह में आ पाएंगे ?" साधना ने सवाल किया |

"नहीं, समय थोडा कम है | आ नहीं पाऊँगा | पर मैंने तुम्हें याद दिलाने के लिए कॉल किया है की आज जब तुम्हें अवार्ड मिले तो थेंक यू लिस्ट में मेरा नाम लेना मत भूलना | याद है , तुमने कहा था की तुम्हारी सफलता की सीढी मुझसे शुरू हुई थी ...मैंने ही तुम्हें उस डिरेक्टर से मिलाया था जिसके साथ तुम्हें ये अवार्ड दिया जा रहा है | " विश्वास की बात पर साधना को विश्वास नहीं हो रहा था |
"आपकी इंट्रो को मैं पहले ही एक्नोलेज कर चुकी हूँ | और इसके सिवा मैं आपके लिए कुछ नहीं कहना चाहती ..." साधना कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर कुछ सोच कर रुक सी गयी | कई सवाल थे जिनके जवाब मांगने बाकी थे , कई आंसू थे जिनकी वजह अभी तक साफ़ नहीं थे | और आज इतने दिनों बाद सिर्फ ... इसीलिए फोन किया गया था की समाज में नाम ..

"छी: ....सच , जो सुना ... अभी तक कानों को यकीन नहीं हो रहा है .... इश्वर जो करता है , अच्छा होता है | शुकर है ऐसे मित्र से मित्र का न होना बेहतर है | जस्ट फोगेट ईट ... " साधना खुद को दिलासा देना चाह रही थी पर जैसे रह रह कर एक प्रश्न काट रहा था - "कोई ऐसा कह कैसे सकता है ? आई मीन ... ...हद है !"

सुबह सुबह ही मूड ख़राब सा हो गया |

न चाहते हुए भी हाथ फोन तक पहुँच गए | नंबर आकांक्षा का घुमाया | उधर से एक पहचानी आवाज़ सुनकर बहुत ख़ुशी हुई |

"हाई मैडम , किसी मीटिंग में हो क्या ? बड़ी आवाज़ आ रही है पीछे से | " साधना ने पूछा |

"ओ नो, मैं और ऋषभ लॉस वेगास आये हैं , शोर उसी का है |" बड़ी अलसाई आवाज़ से जवाब आया | लग रहा था की मय और मस्ती खूब जोर मार था |

"अरे , तुम आज शाम समारोह में नहीं आ रही हो क्या? ये क्या बात .." गुस्से से साधना बोली |

"ओह्हो , यार मैं तो भूल ही गयी | तेरी अवार्ड सेरीमनी आज है ? ओह माई गोड | अब तो देर हो गयी | शीट, मेरा तो लॉस हो गया" , आकांक्षा परेशान लग रही थी |

"चल कोई बात नहीं , टी वी पर आयेगा सात बजे , ज़रूर देखना | "साधना ने दुखी होकर कहा |

"नो मेन ! बात तुम्हारे शो की नहीं है , मुझे राठोड जी से मिलना था | उनसे मेरी बात हुई थी उनके कंपनी प्रोजेक्ट के बारे में, और कहीं उनसे मिलना मुश्किल होता है | पर वो तुम्हारे बड़े फेन हैं | इवेंट में ज़रूर आएंगे | अरे यार, प्लीज़ , डू मी अ फ़ेवोर | प्लीज़ उनसे कह देना की प्रोजेक्ट मुझे ही दें.....प्लीज़ साधना ..... देखो प्रोजेक्ट का १० % मैं तुम्हें दे दूँगी| अब खुश ... कर दोगी न .... जस्ट से येस ! ... " आकांक्षा बड़े ही अधिकार से कहती है , चाहे जो कहे |

"आकांक्षा , राठोड जी नियत के साफ़ इंसान नहीं हैं | अगर मेरी मानो तो उनसे दूर रहो और मुझे भी उनसे मिलने को मत कहो | आकांक्षा ...." साधना बात पूरी भी नहीं कर पाई थी की आकांक्षा चीख उठी |

"तुम्हें कुछ नहीं करना स्वीटी , बस हें हें फें फें कर दो ज़रा सा और कह दो मेरा नाम .. वो समझ जायेंगे " आकांक्षा हंसते हुए बोली |

"पर तुम कब समझोगी आकांक्षा .... आई विश यु कुड .....! " साधना को लगा अगर थोडी देर और फ़ोन को पकड़ी रही तो फ़ोन पर ही रो देगी | इसीलिए जल्दी से कुछ बहाना बना कर फ़ोन काट दिया उसने |

"आज दिन ही ख़राब है , किसी का कोई दोष नहीं है | खैर, कोई बात नहीं ....."


शाम को चार बजे, अपने निर्धारित समय से ब्यूटी पार्लोर की लड़की आ गई थी साधना को सजाने के लिए |

कृत्रिम लिपा पुती, ये शो शे बाज़ी , ये तेज़ रौशनी , ये लायिम लाइट -- जीवन के अंधेरे को शायद थोडी देर के लिए ढक देते हैं , पर उसके बाद ...

शो शुरू होने में कुछ ही देर बाकी था | साधना को अभी तक यूँ लग रहा था की उसके दोस्त मजाक कर रहे हैं और अन्तिम क्षण में आकर उसे चौंका देंगे जैसे बच्चे करते हैं - देखो, सरप्रयिज़ ! हम सब आ गए |
फिर साधना कितनी खुश हो जायेगी और सब भूल जायेगी |

सोचते सोचते सेल फ़ोन पर SMS का आइकन देख कर ठिठक गई |

उसे पता था | विवेक का होगा | शायद देर हो गई उसे आने में और उसकी माफ़ी मांग रहा है | घर परिवार वाला बंदा है | देर तो लग ही जाती है | चलो, माफ़ कर दूँगी | मंजुला भी साथ आ रही होगी शायद ! बहुत अच्छी बात है |

उसने SMS पढ़ा , फिर सेल फ़ोन ऑफ़ कर दिया |

साधना का नाम माइक पर दुबारा पुकारा गया |
किसी ने साधना को ध्यान दिलाया की जाओ साधना , तुम्हें बुला रहे हैं | तालियों से हॉल गूँज रहा था |

साधना के ज़ेहन में SMS के शब्द घूम रहे थे |

"साधना, आज शो में आ नहीं पाएंगे। ऑफिस में ज़रूरी काम आ गया है | और हाँ, एक रेकुएस्ट है | तुम्हारा सौंड सिस्टम चाहिए एक दिन के लिए | मैं ही आ के ले जाऊंगा | तुम रामू को बता देना| आज तुम्हारे लिए कितने लोग ताली बजायेंगे | तुम्हारे कितने नए फ्रेंड्स बनेंगे , फिर पुराने फ्रेंड्स को मत भूल जाना ... "


साधना ट्रोफी हाथ में लेकर खड़ी थी | मंद मंद मुस्कुरा रही थी | अब वाकई उसे एक्टिंग करना आ गया था|
ये कलाकार भी अजीब होते हैं | इनके लिए क्या जीवन है और क्या अभिनय , ठीक से कहा नहीं जा सकता ......

Tuesday, January 13, 2009

मत थम ....जरा आहिस्ता चल........

"कनिका, तुम्हें पता है दुनिया का सबसे शांत ज्वालामुखी कहाँ है ?" किचेन में सफाई करते हुए सुजाता ने अपनी सहेली से फ़ोन पर पूछा|
"अरे यार , इतनी रात को तुम्हें जी. के. सूझ रहा है ? चलो, तुम्हीं बता दो कहाँ है ?" कनिका ने बहुत ही अलसाए ढंग से कहा |
"हमारे दिल में पागल ! हा हा हा" हँसते हुए सुजाता ने कहा |
"वैरी फनी, हाँ ? अच्छा वाक पे चलोगी ? मुझे बहुत काम है और नींद आ रही है | थोड़ा घूम आयेंगे तो फ्रेश हो जायेंगे |"कनिका ने जम्हाई लेते हुए पूछा |
"आइडिया बुरा नहीं है | वैसे भी बच्चे सो गए हैं | और ये कंप्यूटर पर लगे हुए हैं | चल , दो जन चलेंगे तो दिल लगा रहेगा |" झटपट जैकेट पहन कर सुजाता घर से बाहर आ गई | पाँच मिनट में पड़ोस की कनिका भी हिलते डुलते आ गई |
"और काम कैसे चल रहा है मैडम? कैसा है तुम्हारा तन्मय ?" मुस्काते हुए कनिका बोली |
"अब मजाक मत करो यार , वैसे भी बस नौकरी ही है , कोई बहुत बड़ी बात नहीं है | और बाई द वे , वो 'मेरा' तन्मय नहीं है | बस एक पुराना दोस्त था और अब तो वो भी आई गई सी बात हो गई है | देखो तुम, जब तुम्हें कोई बचपन की सहेली मिलती है तो पहले कितनी खुशी होती है, है की नहीं? बताओ तुम .... पर फिर लगता है - बिग डील ! " मुंह बिचकाते हुए सुजाता ने कहा |
"काम ठीक है, दोस्त भी ठीक ही है तो फिर ये शांत ज्वालामुखी का फंडा क्या है ? अबे, कोई गड़बड़ तो नहीं ..." कनिका ने हाथ उठाते हुए थप्पड़ का इशारा किया |
"ओह नो ! क्या बात कर रही हो ? तुम भी न ... कुछ भी कहती हो ... मैंने तो यूँ ही कहा था | तुम्हें पता है कनिका दुनिया का सबसे बड़ा दुःख क्या है?.......................... किसी भी बात का काम्प्लेक्स होना ! अगर तुम्हें इस बात का बार बार एहसास कराया जाए की तुम किसी बात में किसी से कम हो, तो सोचो किसी का कांफिडेंस कितना हिल सकता है .... " सहसा ही जैसे सुजाता को कुछ याद आया |
"क्या हुआ यार , किसी ने कुछ कहा क्या? बता ना क्या हुआ "कनिका ने सुजाता को पकड़ कर कहा |
" रुक ना, बताती हूँ......ऑफिस में ना .... मेरे कुछ ही दिन पहले कशिश ने काम शुरू किया था| यार, तन्मय की डायरेक्ट रिपोर्ट है | आई आई टी और स्तान्फोर्ड की टोप्पर है | बहुत ही ज़्यादा स्मार्ट और बेलेंस्ड लड़की है | दुर्भाग्य वश मैंने भी उसी टाइम में ज्वाइन किया है | अब सब लोग मेरा काम उसी के साथ नापते हैं | आज मीटिंग में भी तन्मय एक घंटा उसी का गुन बखान किए जा रहा था | उससे ये सीखना चाहिए , उसका लॉजिक देखो , उसका ये, उसका वो... अरे मैं मैं हूँ , मुझे किसी के जैसे बनने की ना इच्छा है ना ज़रूरत | हाँ मैं उसके जैसी नहीं हूँ, पर वो भी मेरी जैसी नहीं है | और पता है , क्या हुआ ... " उदास से चेहरे में सुजाता बोली |
"क्या ?" कनिका सुन रही थी और सुजाता अपनी सारी भडास जैसे एक ही साथ निकाल रही थी |
"आज मुझे मेनेजर ने राउटर को कोंफिगर करने के लिए दिया था | मैंने कभी भी ये किया नहीं था | हमेशा कोडिंग की और अब तो वो भी नहीं दिया मुझे , अब तो टेस्टिंग में ही दिन बीत रहे हैं | वो मेनेजर भी ना इतना इदिअट है की पूछो मत | थोड़ा सा हेल्प भी नही किया उसने, बस लो और करो जी | अनिवे, मैं अपना ट्राई कर रही थी की वहां से तन्मय किसी कारणवश गुज़रा, मेरी मति मारी गई थी की मैंने उससे राउटर के बारे में पूछ लिया | बहुत बड़ी गलती की | आगे से उससे बात भी नहीं करनी चाहिए , नहीं करूंगी, आई प्रोमिस !" गुस्से से अब सुजाता मुट्ठी भींच रही थी |
"पर हुआ क्या , कुछ बताओगी या बस ऐसे ही एक्टिंग मारोगी " कनिका ने उत्सुकता वश कहा |
"उसने बताया और कुछ इस तरह, की मुझे जता दिया की मुझे कुछ नहीं आता .... और मुझे आज बहुत ख़राब लग रहा है .... कुछ इस तरह जैसे वाकई मैं... कनिका क्या मैं रियली स्टूपिड हूँ ? मैं आज सोच रही हूँ की क्यों मुझे मेरा मेनेजर कोई भी क्रिटिकल काम नहीं देता , बाकी सबको देता है , क्यों ?" सुजाता ने उम्मीद की की शायद कोई मरहम कनिका रख देगी ..

"हाँ , स्टूपिड तो तुम हो ..पर बहुत ही क्यूट स्टूपिड ... और क्यूटनेस से भी बढ़कर है तुम्हारा ड्राइव " खिलखिलाते हुए कनिका ने कहा | "अरे पागल, तुम्हारी टीम में लोग दस साल से काम कर रहे हैं तो क्रिटिकल काम तो उनको ही मिलेगा ना | तुम तो अभी सीख रही हो, अभी से कैसे कोई बड़ा काम तुम्हें सौंप देगा ? बस जो तुम्हें मिले उसे ध्यान से करो, सब अपने आप ठीक हो जाएगा| हाँ , तो तुम्हारा राउटर कॉन्फिगर हो गया आज?"
"नहीं , कहाँ हुआ , कुछ प्रॉब्लम हुआ फिर काम अधूरा रहा |मैंने ऐसे ही कह दिया की मेरा थोड़ा दिमाग कम है शायद , इसीलिए बात समझ नहीं आ रही ... तो पता है तन्मय क्या कहता है ...... कहता है ... वैसे भी गर्ल्स लोगों का दिमाग कम होता है .... हाउ मीन ना ? ....मैंने उससे कह दिया ......ऐसा .. नहीं है .....ज्यादातर गर्ल्स लोग बहुत स्मार्ट और इंटेलिजेंट होते हैं |" इससे ज़्यादा शायद और बुरा नहीं मिल सकता था सुनने में |
मैं ग़लत थी | इससे भी ज़्यादा सुनने को मिल सकता था |
"पता है फिर तन्मय क्या कहता है - हाँ गर्ल्स स्मार्ट होती हैं - कशिश जैसे |" सुजाता ने कनिका को देखा फिर ज़मीन की तरफ़ जैसे की कुछ गिर गया हो और ढूँढने की कोशिश कर रही हो |
"तुम्हें इतना बुरा क्यूं लगा | कशिश की तारीफ से या तन्मय ने की, इस बात से ?" कनिका सवाल पे सवाल कर रही थी |
"चलो छोडो भी, की फरक पैंदा है | बात किसने की ये नही है पर क्यों की | और वो भी किसी और को नीचा दिखाते हुए | तुम्हें लग रहा होगा की मैं जल रही हूँ | हाँ सच है | पर उससे ज़्यादा मुझे काम्प्लेक्स हो रहा है | पता है दुनिया में सबसे खतरनाक गिरना क्या होता है, जब हमारा कांफिडेंस गिर जाता है और मुझे यहाँ पर ऐसा ही लग रहा है | मुझे पता है मुझे बहुत सारी बातें नहीं पता हैं, पर मैं कोशिश कर रही हूँ | पर अगर हर मोड़ पर कोई टोक दे तो फिर तुम बताओ ...... | यहाँ पर हर बन्दा या तो दस पन्द्रह साल से काम कर रहा है या फिर किसी बड़ी नामी गिरामी कॉलेज का टोप्पर है | मानती हूँ मेरी हस्ती थोडी कम है पर मैं भी कोई कम नहीं हूँ | देख लेना, बस एक साल में मैं अपनी पहचान बना लूंगी फिर ये सब जो हैं ना , देखते रह जायेंगे | " सुजाता अपने ही भाव के ज्वार भाता से आश्चर्य चकित थी |
"ये हुई ना बात , क्या स्टाइल है, जियो मेरी जान ! ये एकदम इतना दम कहाँ से आया ?" कनिका ने कोहनी मारते हुए पूछा|
"पता नहीं , जब वाक पर निकले तो बहुत घुटन सी थी पर बात करते करते ऐसे लगा जैसे सब लावा बह गया और ज्वालामुखी जैसे सचमुच शांत हो गया हो | अच्छा हुआ हम आज घूमने आए | रोज़ आया करेंगे , ठीक?" बड़ी ही जोश में सुजाता ने कहा |
" कल की सोचेंगे कल को, अब जाओ और आराम से सो जाओ .....ना कशिश की चिंता करो और ना ही काम की | बस अपना हौसला बनाए रखो, किसी को उसे छूने मत दो , ओके?"

"थेंक्स यार , बस किसी से बात ही कर लो दिल खोल कर , तो कितना हल्का लगता है | तुम्हारा शुक्रिया कैसे करुँ? थेंक्स सो मच ! " सुजाता बहुत खुश लग रही थी |
" किसी ने मुझे यही बात समझाई थी | मैंने तुम्हें पास कर दिया | जब तुम्हें लगे की कोई ऐसा है जिसे तुम्हारी ज़रूरत है तो उसकी मदद करना, उससे बात करना , बस मुझे शुक्रिया कह दिया समझना , ठीक है?" कनिका ने सुजाता के गालों पर थपकी मारते हुए कहा |

"बिल्कुल, चलो गुड नाईट , फिर मिलेंगे ..." सुजाता कूदते हुए अपने घर वापस आ गई |

सुजाता अब अगले दिन का इंतजार कर रही थी |
वो कल ऑफिस में राउटर को सही तरीके के कॉन्फिगर करेगी , बिना किसी के मदद के |

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Tuesday, January 6, 2009

अपना भी कोई एक घर होगा !

"अगर कौडियों में सबसे अच्छे इलाके में घर चाहिए तो अभी के अभी इस पते पर पहुँच जाओ .... और सुनो मेरा अप्रूवल पेपर ले जाना .... और हाँ बस उनके रेट पर ऑफर दे देना | मैं कल ही वापस आ रहा हूँ |" देव, हमारे एजेंट ने एक ही साँस में इतनी लम्बी बात कह डाली | ऐसा लग रहा था की जैसे लॉटरी की टिकेट लग गई हो और बस उसे भुनाने की देर हो |

वाकई कुपर्तिनो में इस दर पर ये घर नामुमकिन सा लगा | फिर पता चला की ये एक फोर क्लोस्ड घर है जिसे बैंक जल्द से जल्द बेचना चाहती है | इसी कारण इसका दाम कम रखा है ताकि बिक जाए |

तनुष बहुत खुश थे | हम करीब तीन साल से घर ढूंढ रहे हैं | ऐसा घर जो हमारे बजट में आ जाए, जिसमे स्कूल अच्छे हों और जिसमें कम से कम दो बाथरूम हों ! पिछले दस साल से एक बाथरूम के कोंडो में झेल रहे आंसूओं को तो बस हम ही जानते हैं | लेकिन सिलिकन वेळी में शायद सब लोग यही चाहते हैं जो हम चाहते हैं | तभी तो पचास हज़ार डॉलर ज़्यादा ऑफ़र देने पर भी हमें घर नहीं मिला था एक बार | ऐसे में इतने कम दर पर ये घर एक दुआ कबूल होने के जैसा था |

हम जिस कपड़े में थे उसी में निकल पड़े | बच्चे एक बर्थडे पार्टी में गए हुए थे | सोचा लौटते हुए उन्हें ले लेंगे | तब तक ये काम बन जाए तो ...

बाहर से घर देखने में बुरा नहीं था | वैसे भी लुक्स पर कौन जाता है | जो दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है ?

हम जैसे अन्दर जा रहे थे तो कुछ लोग बाहर आ रहे थे | एक अजीब सी परेशानी सी दिखी उनके चेहरे पर, जाने क्यों ?

अन्दर माहौल बहुत बिखरा बिखरा सा था | जैसे कोई बहुत ही हफ्रा तफरी में गया हो और जल्दबाजी में आधा समान छूट गया हो | देख के थोड़ा सा नर्वस लगा |

जाने किसकी नौकरी छूट गई होगी , जाने क्या मुसीबत होगी उसके सर पर, जाने कहाँ गया होगा उसका परिवार घर छोड़ कर , जाने ... मेरी सोच टूट गई जैसे ही मैं मास्टर बेड रूम में गई और एक बड़े से टूटे हुए आइने में मैंने अपने आप को देखा |

उस कमरे की एक एक चीज़ जैसे बड़ी तस्सली से लगाई गई हो | वो क्लोसेट का डिजाइनर दरवाज़ा हो या खिड़कियों पर गोल्ड फ्रेम का डेकोरेसन | हर चीज़ की एक ख़ास खूबसूरती थी जैसे किसी ने बड़ी फुर्सत से उसे चुना हो पर जितना प्यार , उतना ही क्रोश निकाला गया है, ऐसा लग रहा था ...क्योंकि उस कमरे की हर एक डिजाइनर चीज़ टूटी हुई थी... तोडी गई थी ... बड़ी बेरहमी से... वैसे भी हम उसी पर ही तो अपना गुस्सा निकाल सकते हैं जिस से हम प्यार करते हों, बहुत प्यार करते हों ...

अमरीका भर में बहुत ही बुरा वक्त चल रहा है | जिस देश को मैंने कभी इतने उन्नत स्टेज पर देखा था , वहीँ पर आज ऐसी दुर्दशा देख कर मन द्रवित हो जाता है | जाने ये मुआ रिसेसन कब जायेगा | कब लोगों की दहशत ख़तम होगी | आज हर आदमी घर से यही सोच कर निकलता है की शाम तक उसकी नौकरी सलामत रहे | रोटी पानी बनी रहे | किसी को भी आज जॉब सिक्यूरिटी नहीं रही | कल क्या हो ये कोई नहीं कह सकता |

अचानक अपना नाम सुनकर मैंने हाँ कहा | लगा तनुष बुला रहे हैं शायद |
"क्या है, तुमने बुलाया ?" बाहर आते हुए मैंने पूछा |
"नहीं तो , तुम्हारे कान बज रहे हैं क्या ? अच्छा देखो , मैंने इनके एजेंट से बात कर ली है | सब कुछ हो जाएगा | आज के आज ही सब फिट कर देते हैं , अभी ये घर मार्केट में आया भी नहीं है, कम दाम में मिल जायेगा ... " तनुष बहुत उत्तेजित लग रहे थे |

"ज़रा रुक जाओ .." एक अजीब सा डर लग रहा था |

क़दम अपने आप ही एक के बाद एक कमरों में जा रहे थे | हर कमरा एक अलग कहानी कह रहा था |
टूटे दर्पण वाला कमरा मास्टर बेडरूम था | ये वाला कमरा शायद बच्चों का होगा | अभी तक दीवारों पर प्रिंसेस के पोस्टर लगे हुए थे | उनकी बेटी या बेटियाँ होंगीं | छोटी होंगीं | अलमारी से अब तक गन्दगी साफ़ नहीं हुई थी | बिखरे बिखरे अखबार और यहाँ वहां के डॉक्यूमेंट भरे पड़े थे | समय कम था फिर भी मन में बात जागी की देखूं तो डॉक्यूमेंट से कुछ पता चले | हाथ लगा ही था की एक बड़ा सा फाइल निचे गिर गया और सारे कागज़ कमरे भर में बिखर गए |
अरे अरे ! उसे समेटने के लिए मैं झुक गई ताकि फिर उसे अपने जगह पर रख दूँ |

जल्दी जल्दी करने की कोशिश कर रही थी | पर जैसे हर पन्ने को पढ़ ने का मन कर रहा था |

और फिर कुछ हाथ लगा | उसकी पीठ थी मेरे हाथ में.... एक फोटो का पिछला हिस्सा... सफ़ेद होता है न जो | मुझे पता था की ये उन्हीं लोगों का होगा जिनका ये घर था | मुझे देखना नहीं चाहिए ... दुःख होगा | नहीं नहीं , इसे फेंको और यहाँ से भाग जाओ | जाओ ... मैंने कहा न |

पर जैसे पाँव उठते ही नहीं थे | हाथ उस फोटो को छोड़ने को तैयार ही नहीं थी | किसी का दुःख देख कर तुम्हें क्या मिलेगा , तुम जाती क्यों नहीं हो? पर मैंने फोटो को मोडा और उन को देखा ...

परिवार चाइना का लग रहा था | फोटो उनके बच्चे के पहले जनम दिन का था शायद | इसी घर में लिया गया था उस बड़े वाले लिविंग रूम में | भरा पूरा परिवार हंस रहा था | दो बूढे माँ बाप भी दिख रहे थे पीछे खड़े हुए | बड़ी रौनक छाई हुई थी, बहुत ...

"और सुनो , इतना काम पड़ा है और मैडम आंसू टपका रही हैं " तनुष कमरे में आते हुए बोल पड़े |

मुझे पता ही नहीं चला कब आँख भर आई थी | आंसूं बह रहे थे और मुझे होश ही नहीं था | मैं भी इतनी स्टूपिड हूँ न !
ओ माय गौड़ ! मैं आँख पोंछने की इतनी कोशिश कर रही थी पर जैसे रुकते ही नहीं थे | तनुष से मुंह छुपा कर मैं बाथरूम मैं घुस गई |

मुझे इतना कमज़ोर नहीं होना चाहिए | ऐसी भी क्या भावुकता | न जान न पहचान , और ये सब तो होता रहता है| शायद वे लोग आज भी खुश हैं , जहाँ भी हैं | और तुम्हारे परेशान होने से किसी का भला तो नहीं होगा न .... तुम क्या कर सकती हो, जो होना था वो तो हो चुका है |

ख़ुद को मन भर का हौसला देने के बाद , बहते हुए दरिया को बाँधने के बाद , जैसे ही नज़र उठाई , एक बड़े से पोस्टर से मैं टकरा गई .... ठीक मेरे सामने था ... मुझे कुछ कहता हुआ ... मुझपे हँसता हुआ .... या शायद रोता हुआ .... उस पर प्रभु ईसू का फोटो था ... क्रॉस पर लटकते हुए ... एक औरत हाथ जोड़े खड़ी थी क्रॉस के नीचे.... और कुछ लिखा था...

"...... This too shall pass !"

फिर न मैंने ख़ुद को समझाने की कोशिश की और न ही वहां रहने की| बाहर तनुष खड़े थे |
भाग कर उनसे लिपटते ही मेरा बाँध टूट गया | फूट फूट कर आंसू बाहर आ रह थे |

"तनुष हम यहाँ नहीं रहेंगे, मुझे नहीं चाहिए ये घर| इसकी गंध में एक उमस है , एक आह है | तनुष, हमें यहाँ नहीं रहना तनुष , नहीं रहना हमें यहाँ .... ऊं ऊं ऊं ......भगवान् न करे ... अगर कल हमारे साथ ऐसा कुछ... " मेरे मुंह से कुछ भी निकाल रहा था , बिना सोचे बोल रही थी मैं |

"पागल हो तुम. अरे ऐसा डील फिर नहीं मिलने वाला | हमारा सब रेडी है | बस साईन करने की देरी भर है | चलो चलो ज़्यादा इमोसनल नहीं होते हैं | आते ही सत्य नारायण पाठ करवाएंगे | सो, हवा भी शुद्ध हो जायेगी | कब से कह रही हो कोंडो में जगह कम पड़ रही है | एक बाथरूम में कितनी दिक्कत आ रही है | और सुन लो , अब तो जो घर आयेंगे मार्केट में, उनमे से आधे इसी तरह के होंगे | अब हर घर से तुम्हें आह सुनाई दे तो फिर भइया हो गया बेडा पार ... " तनुष मेरी बात को सुन ही नहीं पा रहे थे शायद या मैं ही कुछ ज़्यादा सुन रही थी ... पता नहीं ....

"नहीं तनुष, हर घर से एक ध्वनि आती है, एक वयिब होता है, मुझे यहाँ पर किसी की हाय सुनाई देती है | जब मैं यहाँ आई थी तब मुझे कुछ नहीं था पर यहाँ कुछ है , जिसे मैंने फील किया है | तुम्हें नहीं लग रहा ... कुछ अन्दर से ..." मुझे यकीन नहीं हो रहा था की जिसे मैं अपने में इतना धड़कता हुआ महसूस कर रही हूँ , वो किसी और को क्यूँ नहीं हो रहा ????

"तनुष , हम अपने छोटे से कोंडो में ही रह लेंगे | अब प्लीज़ चलो यहाँ से ......प्लीज़ .......... "

तनुष मौके की नजाकत को समझते हुए बाहर आ गए , वैन का लौक खोला और गाड़ी स्टार्ट की |
अपना बेल्ट बांधते हुए मेरे मुंह में ये गीत बार बार आ रहा था -".. किसी का प्यार न टूटे, किसी का घर द्वार न छूटे ..." |

उस घर से अपने घर तक आते आते तीन घरों पर "Bank Owned" का बोर्ड लगा हुआ देखा |

सी डी पर गीत बज रहा था -

इन भूल भुलैया गलियों में अपना भी कोई एक घर होगा ,
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या खिड़की पे खुला अम्बर होगा ,

पल भर के लिए इन आंखों में हम एक ज़माना ढूंढते हैं ...
आबोदाना ढूंढते हैं एक, आशियाना ढूंढते हैं .......

Tuesday, December 16, 2008

दिल का हाल सुने दिलवाला....

तन्मय सीरीज़ पार्ट

"तन्मय, तुमसे बड़ा ईडिअट मैंने आज तक नहीं देखा | विश्वास नहीं होता की तुम ऐसा कर सकते हो| क्यों तन्मय ? क्यों किया ऐसा तुमने ?" गुस्से में सुजाता कुछ भी कह रही थी |
"कम ओन, इसमे इतनी बड़ी बात क्या है ? " बड़ी सरलता से तन्मय ने कहा|
"बड़ी बात क्या है? ये तुम कह रहे हो | याद है तुम ही ने मुझे इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया था | मैं जानती हूँ तन्मय की इसके साथ क्या कुछ जुडा था तुम्हारा | इतना बड़ा प्रोजेक्ट फ़ेल हो गया तन्मय और तुमने मुझे बताया ही नहीं | मैं समझती थी की तुम मुझे अपना दोस्त समझते हो| तुमने इस काबिल भी नहीं समझा की अपनी बात खुल कर बता सको | छिः ! और ऊपर से मुझे ये कहा की सब मस्त हो गया | ये मस्त हुआ है? हाँ ?" सुजाता जाने क्यों इतना भड़क रही थी |
"तुम्हें किसने बताया ?" सवाल सीधा था|
"अरे इतनी भी डम्बो नहीं हूँ मैं | हाँ , हाय लेवल पर नहीं हूँ पर ग्रुप में तो हूँ | क्या समझे ? तुम नहीं बताओगे तो मुझे पता नहीं चलेगा? अब समझी मैं, क्यों इतने दिनों से मेरे सामने आते कतराते थे | एक पल में ही पराया कर दिया, नहीं क्या?" अब गुस्सा कम होते होते स्वर में उदासीनता झलक रही थी | और दरअसल गम और गुस्से का फर्क ज़्यादा होता भी नहीं है | कब क्या कौन सा रूप ले ले पता नहीं चलता |
"नहीं मैं तुम्हे भी दुखी नहीं करना चाहता था | जो हुआ सो हुआ | अब क्या कर सकते हैं ? तुम अभी अभी आई हो | और तुमने इतनी मेहनत की थी उस प्रोजेक्ट में, तुम्हें निराशा नहीं दिखनी चाहिए नहीं तो तुम्हारा मोरल डाउन हो जाएगा | " मुस्कुराते हुए तन्मय ने कहा |
"पर तुम ऐसा किस तरह कर पाये | इतना सब कुछ हो गया और तुम हँसते रहे | और तो और, तुमने मुझसे जगह भी पूछी जहाँ मंजुला को ले के जा सको | मैं समझी वाकई सब सही है | आई ऍम सो डम्ब ना !" माथे पर हाथ रखते हुए सुजाता ने कहा |
"ईडिअट! तुम्हारा बर्डे था उस दिन,पर बहुत देर हो गई थी | तुम्हारा ट्रीट भी देना है | उस दिन तो नहीं जा सके पर ये जानना चाहता था की किस जगह तुम्हें अच्छा लगता है | ताकि फिर कभी जा सकें | चलें आज, फ्रेश चोइस ? "खिलखिलाते हुए तन्मय ने कहा |
"शट अप्! मुझे अच्छी तरह से पता है की तुम किस दौर से गुज़र रहे हो | और ज़्यादा एक्टिंग मत करो | चलो वाक कर के आते हैं | और मुझे बताओ की ऐसा कैसे हुआ ? सब तो सही लग रहा था | एकदम सब फ़ेल कैसे हो गया ? " डांट ते हुए सुजाता ने कहा |

तन्मय ने वाक के दौरान सब विस्तार में बताया की किस तरह उसके कुछ प्रतिद्वंदियों ने कपट से उसका प्रोजेक्ट फ़ेल किया है , हालाँकि प्रोजेक्ट के लॉन्च से सबका भला होता | पर यह ज़ाहिर था की इसकी नाकामयाबी पर तन्मय बहुत बदल गया था | खुशी का मुखौटा जो उसने ओढ़ रखा था , उसके उतरते ही वो बहुत ही दिप्रेस्स्ड और चुप सा दिखने लगा |

किसी हँसते खेलते दोस्त को मुरझाते देख अच्छा नहीं लगता |

"कोई बात नहीं तन्मय फिर से ट्राई करेंगे | ये सब तो चलता रहता है | बुरे वक्त के कारण ही अच्छे दौर की कदर होती है | और बड़ी बात ये है की अब तुम्हे दोस्त-दुश्मनों की पहचान भी हो गई ताकि तुम उनसे सावधान रह सको | " सुजाता अपनी नसीहतें देने में देर नहीं करती थी |
"मेरी माँ, अब बस करो | "हाथ जोड़ते हुए तन्मय बोला | पर हँसी अब भी गायब थी |
"ऐसे कैसे बस करुँ? ऐसे ही मौकों के लिए मेरे पास बहुत सारे फंडे हैं | सुनाऊं? " तन्मय को हँसाना ज़रूरी था |
"ऐसे हाथ को क्रॉस कर के क्यों खड़े हो जैसे की अभी मुझसे लड़ने वाले हो ..." सुजाता ने बात बदलनी चाहिए |
"अब क्या लडूंगा? जहाँ लड़ना था वहां तो कुछ नहीं कर पाया ... सुजाता , बात घूम फिर कर वहीँ आ जाती है | हम चाहे जितना भी , कुछ भी कर लें , पर ये आख़िर नौकरी ही है, और हम हैं - नौकर !" अब धीरे धीरे रोष निकल रहा था |
अच्छा है, गम और गुस्से में फर्क नहीं होता | और दोनों का निकल जाना हरियाली की ओर पहला क़दम है |
तन्मय की बात जैसे अभी शुरू ही हुई थी -"तुम मानोगी नहीं , पिछले एक साल से मैंने क्या नहीं किया है ? गधे की तरह, दिन रात , सब कुछ भूल कर , लगा हुआ हूँ, सब लोग जानते हैं की कैसे हमने इस प्रोडक्ट को स्टार्ट किया है | ऐसे कैसे सब भूल सकते हैं लोग ? पता है सुजाता , मेरा एक प्रॉब्लम है , मैं अपने काम की मार्केटिंग नहीं करता , शायद इसी वजह से ... | "
"नहीं तन्मय , सब लोग जानते हैं , अच्छे वर्कर को पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं होती| और हाँ , सब जानते हैं तुम्हारी काबिलियत को | तुम्हें किसीको कुछ प्रूव करने की ज़रूरत ही नहीं है | "बीच में ही सुजाता बोल उठी |
"पर अब बहुत हो गया | तमन्ना को जानती हो न, मेरी बॉस , उसको पता है मेरा काम, फिर भी अपने दोस्त को ही सप्पोर्ट करती है | ओके , अब बहुत हो गया | अब मैं आठ घंटे ही काम करूंगा | अब और नहीं ... न पैसे बढाते हैं, न प्रमोशन देते हैं... न प्रोजेक्ट लॉन्च करते हैं.... कोई करे तो क्या करे ! " तन्मय की आवाज़ अब बहुत दूर दूर तक सुनी जा सकती थी |
"तन्मय मुझे पता है ! टीम में ही अगर लोग गुट बनाकर पॉलिटिक्स करने लगें तो बहुत मुश्किल हो जाता है | पर तुम रीयाक्ट मत करो , रेस्पोंसिब्ली एक्ट करो | देखना सब ठीक हो जाएगा | इश्वर का शुक्र करो की इस ख़राब इकोनोमी में तुम्हारे पास एक जॉब है | पता है , मेरे पास एक बहुत बड़ी दवा है , इस सिचुअशन से लड़ने का | " सुजाता बोली|
"ऐसा क्या है , ज़रा हम भी तो सुनें ..."तन्मय ने फिर से हाथों को क्रॉस किया , जैसे की लड़ने की पूरी तयारी में हो!
"तुम्हारी गुडिया है न, मुझे पता है उसमे तुम्हारी जान है .." सुजाता ने धीरे से कहा ..
"हाँ , वो तो है ... पर तुम्हें कैसे पता ?" तन्मय को आश्चर्य हुआ |
"अरे, लो कर लो बात ....एनीवे... मैं कह रही थी की ... आज ही अपने रूम में उसकी एक फोटो ठीक चेहरे के सामने लगाओ और रोज़ अपनी डायरी में एक बात ऐसी लिखो जो उसने कही हो या की हो | देखना अपने आप सब भूल कर मन अच्छा हो जाएगा | दरअसल, जब हम जीवन की छोटी छोटी खुशियाँ भूल जाते हैं .. तो शायद जीवन भी हमें भूल जाता है | जीवन को फिर से अपने जीवन में लाओ तन्मय, सारेगामापा देखते हो? उसमे अस्मा कहती है न? .........." मुश्किल नहीं है "| है नहीं ..? " सुजाता की बात ख़तम होने से पहले ही तन्मय बोल पड़ा- "ओह माय गोड! शी इज सो क्यूट ! अरे यार , उस से पहले वो भी थी न, कौन थी वो ? माली नहीं मौली , माय गोड !, मैं मंजुला से कहता था - देखना ये लड़की जीतेगी ... मैया मैया..... क्या मस्त गाती थी मालूम .. "

सुजाता समझ गई थी की उसका दोस्त अब लौट आया है |
अब तन्मय हंस रहा था, बाकी सब बातें भूल के .. पुराने दिनों जैसे|
अब उसकी खुशी दिखावटी नहीं थी |

"तन्मय , याद है , कॉलेज में स्प्रिंग फेस्ट में हम सबने मिलकर एक गाना गाया था .. वो जो जीता वही सिकंदर से .. क्या था वो..." सुजाता याद करने की कोशिश करने लगी |
"अरे हाँ ! वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है .... टें टें टें टें टें .... अरे तुम भी गाओ न ... तुम भी तो ग्रुप में थी न ? याद नहीं है क्या ?" बड़ी मस्ती में तन्मय पूछ बैठा|
"चलो गाते हैं ..." सुजाता ने देख कर हँसते हुए कहा |

"वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना जिसे आता है ,
निकलेंगे मैदान में जिस दिन हम झूम के ,
धरती डोलेगी ये क़दम चूम के,"

"नहीं समझे हैं , वो हमें, तो क्या जाता है ,
हारी बाज़ी को जीतना हमें आता है ".......................टें टें टें टें टें !
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Saturday, December 13, 2008

कतरा कतरा मिलता है ..कतरा कतरा पीने दो ....

"सुजाता, लगता है मुझे अवोइड करने की कोशिश कर रही हो | क्यों सही कहा न ??" तन्मय ने मुस्कुराते हुए कहा |
"कोशिश नहीं तन्मय , कर रही हूँ | काम बहुत आ गया है " सुजाता ने व्यस्तता जताते हुए कहा |
"मेरी टीम को जोइन क्यों नहीं किया , और तो और, किसी इंडियन को नहीं बल्कि उस चपटे मेनेजर को चुना | मेरी रिपोर्ट बनती तो तुम्हारा करियर कहाँ पहुँच जाता , कुछ पता है ?" तन्मय अपना रोष निकाल रहा था |
"नहीं, दोस्त को बॉस नहीं बनाना चाहिए | कंफ्लिक्ट अफ इंटरेस्ट हो जाएगा | वैसे भी मेरी हामी तो नाम मात्र की थी , निर्णय तो पहले ही लिया जा चुका था | इतनी बड़ी कंपनी में पॉलिटिक्स भी बड़ी बड़ी होती है | अच्छा ये बताओ इस तरफ़ कैसे आना हुआ ? सर दर्द कर रहा है , काफी पीना है ? हा हा हा " सुजाता को वह पहला दिन याद आते ही हँसी नहीं रूकती थी |
"नहीं सूजी ! एक बहुत ज़रूरी लेख लिखना है , वैसे तो मुझे लिखना चाहिए पर प्लीज़ , तुम लिख दो | अगर ये प्रोजेक्ट सफल हो जाए तो लंच पे चलेंगे | पक्का!"फिर तन्मय ने विस्तार से बताया की इस प्रोजेक्ट का कितना महत्व था उसके लिए |
"ठीक है , चलेंगे, पर अभी नहीं , हो सके तो बारह तारीख फ्री रखना, उस दिन कुछ ख़ास है मेरे लिए , उस दिन चलेंगे, ओके? " सुजाता ने हँसते हुए कहा |
"तुम्हारा बर्थडे है क्या ?" हटात ही तन्मय पूछ बैठा |
"अरे नहीं ! इस उम्र में बर्थडे तो याद भी नहीं रहता ... उस दिन बताऊंगी क्या ख़ास है | अच्छा अब जाओ , मुझे बहुत काम है" सुजाता ने कंप्यूटर पर नज़रें गडाते हुए कहा |
कई दिनों की मेहनत के बाद प्रोजेक्ट का वह महत्वपूर्ण लेख तैयार हो गया |

प्रोजेक्ट कामयाब रहा |

आज बारह तारीख है | कई दिनों से तन्मय दिखा नहीं है | हाँ , इतनी ज़िम्मेदारी के काम पर समय का होश कहाँ रहता है ? चलो कोई बात नहीं | फोरगेट ईट ! यह सोच कर सुजाता अपने काम में लग गई |

डेढ़ बजे बड़ी ही हड़बड़ी में तन्मय ने फ़ोन पर पूछा - "क्या खाना वाना खा लिया क्या?"
कुछ सोच कर सुजाता ने कहा -"हाँ !" हालाँकि टेबल पर भरा हुआ बॉक्स रखा हुआ था , अन छुआ !
"चलो अच्छा हुआ | अभी पन्द्रह मिनट में मेरी एक और मीटिंग है | दस मिनट में खाना खाना है | चलो मैं भागता हूँ | बाद में फ़ोन करूंगा |" तन्मय के बात करते हुए खाने की आवाज़ साथ में आ रही थी |
"ओफ्फो, चैन से खाना खाया करो,एनीवे , तुम्हारी लाइफ है , जो चाहो.."

सामने ही अपने मेनेजर को देख कर सुजाता ने कहा -"चपटा सामने ही है, बाद में ..बाय "
"sujata, I have to go out for some work, can you attend the group meet on behalf of the group. It starts in seqoia at 2 in 10 minutes ? " उसने पूछा |
"स्युअर , नो प्रॉब्लम " सुजाता ने कहा और अपनी कॉपी लेकर चल दी सेकोइया की ओर|
दरवाज़ा खुलते ही सबसे पहले नज़र तन्मय पर ही पड़ी |
कभी कभी हम वही देखते हैं, शायद, जो हम देखना चाहते हैं ..
अच्छा, तो वह खाते खाते इसी मीटिंग की बात कर रहा था |
पर इस वक्त वह 'विरोधी' टीम से था | मीटिंग में कई बार सुजाता को तन्मय और अन्य लोगों की बातों का विरोध करना पड़ा और कई बार उसकी बातों को भी काटा गया | होता है ..

शाम को घर जल्दी जाना था , बच्चों को टाइम से लेना ज़रूरी है वरना फाईन लग जाएगा | और अभी बस एक ही घंटा बाकी है | पर जैसे कुछ बाकी रह गया था |
सुजाता से फ़ोन किया तन्मय को |
"क्या कुछ देर बाद तुम्हें फ़ोन करुँ?" जवाब में तन्मय ने दबे स्वर में कहा |
लगा जैसे कोई हाय - प्रोफाइल बात चीत चल रही थी वहाँ |
"ओके" कह कर सुजाता ने फ़ोन काट दिया |

आधे घंटे बाद सुजाता ने फ़िर कोशिश की फ़ोन मिलाने की, शायद कुछ ज़रूरी बात रह गई थी |
"सुजाता, कुछ देर में फ़ोन करता हूँ, पक्का " तन्मय की हाय -प्रोफाइल बात शायद अब भी चल रही थी|

काफ़ी देर इंतज़ार के बाद भी जब फ़ोन नहीं आया तो सुजाता ने अपना सिस्टम बंद करके अपना समान समेटा और चल दी | अभी कार खोला भी नहीं था की सेल पर रिंग बजी |
तन्मय कोलिंग ! तन्मय कोलिंग !
बार बार रिंग के साथ नाम फ्लैश हो रहा था |
"कहाँ हो ? तुम्हारे क्यूब की तरफ़ आ रहा हूँ " तन्मय ने कहा |
" मत जाओ , मैं घर जा रही हूँ | बहुत देर हो गई है , फिर कभी बात होगी " समान रखते हुए सुजाता बोली |
"क्या बात थी ? तुम कुछ कह रही थी ......" बिना रुके ही तन्मय कहता ही गया " अरे पूछो मत ! इस प्रोजेक्ट की वजह से दिन रात एक हो गए हैं | चलो आज ख़तम हुआ| मंजुला बहुत नाराज़ हो गई है | आज रात उसको बाहर डिनर पे ले कर जा रहा हूँ ! बताओ तो कौन सी जगह अच्छी रहेगी ?"
"फ्रेश चोइस ले जाओ , मस्त जगह है , बहुत आप्शन मिलेगी | " हँसते हुए सुजाता बोली |
"अच्छा चलो तन्मय अभी मैं ड्राइव कर रही हूँ , बाद में बात करेंगे | एंड यू गाएज़ हेव अ ग्रेट टाइम ! फ़न टाइम में काम की बात मत करना | और सारा ध्यान मंजुला को देना , वहाँ पर किसी गोरी को देख कर लाइन मारना शुरू मत कर देना ...... हेहेहे हेहेहे .." इसी बात पर दोनों बहुत ज़ोर से हँसे और अपने अपने रस्ते चल पड़े |

काम बहुत ज़रूरी है | काम ही पूजा है | ऐसा माँ कहती थी |
पर काम के साथ जीवन भी चलता है | और उसका महत्व भी कुछ कम नहीं होता ... होना नहीं चाहिए |

तन्मय जानता है की मैं उसके साथ कभी भी खाने पर नहीं जाऊंगी, शायद.... जा ही नहीं सकती | पर नाम मात्र को भी अगर मुझसे पूछ लिया होता तन्मय, तो मुझे बहुत खुशी होती |
पर मैं मानती हूँ तन्मय काम बहुत ज़रूरी है | काम ही पूजा है | ऐसा माँ कहती है |

अरे हाँ तन्मय , जल्दी में बताना भूल गई | आज वाकई मेरा जन्म दिन था |
.. पर इस उम्र में बर्थडे तो याद भी नहीं रहता......

जस्ट फोगेट ईट !
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Saturday, November 29, 2008

मुड मुड के ना देख ...मुड मुड के ...

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" सुजाता, कॉफी पीने चलोगी?" बहुत सकपकाते हुए तन्मय पूछ पाया था फ़ोन पर|

"चलो" एक शब्द का जवाब सुनकर शायद तन्मय को बहुत हैरानी हुई| सोचा था कुछ सवाल जवाब होगा | क्यों ? कहाँ ? कब ? कैसे ? कितनी सारी प्रक्टिस भी की थी उसने उन सवालों का अंदेशा कर के| सोचने लगा अब भूमिका कैसे बाँधूं? ...

कुछ देर की चुप्पी के बाद कुछ कुछ रटा रटाया बाहर ही गया -"दरअसल, मुझे बहुत ज़ोर से सर दर्द हो रहा है , इसलिए कॉफी पीने का मन कर रहा था | सो मैंने सोचा की अगर तुम भी चलती तो कुछ देर बैठ कर पुराने दिनों की बातें करते | कितना वक्त गुज़र गया है इस दौरान , है ना ? "
"हाँ, सही कह रहे हो ! काफ़ी कुछ गुज़र गया है...खैर , चलो " पीछे कंप्यूटर की टिक टिक बता रही थी की सुजाता फ़ोन पर बात करते करते अपना काम किए जा रही थी| इंसान कितने सारे काम एक साथ कर सकता है - फ़ोन पर बात करना, कंप्यूटर पर काम करना, पुरानी बातें याद करना, सोचना , मुस्कुराना ....

कहने को तो इंजीनियरिंग कॉलेज था पर बेहद रुढिवादी विचार धारा के लोग रहते थे वहां | आज के ज़माने की तरह चलन नहीं था तब | प्यार की कोई जुबां नहीं होती थी , कुछ कहा नहीं जाता था ............... शायद उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी | आपस की समझ बहुत तेज़ होती थी | हाँ , तभी तो प्रोफ़ेसर के सवाल पर कई बार सुजाता और तन्मय का जवाब एक ही साथ आता था ... एक ही जवाब ....चाहे सही हो या ग़लत ... फिर सबका हँसना .......... और दोनों का झेंपना ! आज कल कहाँ वो मासूमियत रही | शायद आज भी इश्क होता है , होता होगा .....

चार सालों में मुश्किल से चार बार उन्हें ऐसा वक्त मिला होगा जिसमे तसल्ली से वे कुछ बतिया सके हों | और उन्ही चार मुलाकातों में एक वो भी था-- फैरवेल पार्टी का आखरी दिन जब उन दोनों को मिल कर हॉल के गेट को सजानाथा | यूँ तो छः लोगों को मिल कर करना था ये काम पर जहाँ बाकी लोक नौ बजे की जगह ग्यारह बजे पहुंचे थे , तन्मय वहां पर सुबह आठ बजे से बैठा था | कोई बात नहीं हुई थी पर जाने कैसे सुजाता भी वहां सवा आठ बजे ही गई |
"मैं सोच रहा था की काम जल्दी हो जाए इसीलिए गया " तन्मय हड़बड़ी में कह उठा |
"ओफ्फो , मैंने तुमसे पूछा है क्या ? वो हथौडा देना " मुंह में सुई पकड़े सुजाता ने कहा |
"ये लो ..." बिना देखे हथौडा देते हुए हाथ अचानक सुजाता के हाथ से टकरा गया | हथौडा गिर गया | सुजाता के पाँव पर |
"आय ऍम सो सॉरी , ओह माय गौड़ ! रियली सॉरी ..." बड़े ही खेद भाव से तन्मय कहता गया, बार बार |
"इट्स ओके , अब अपना काम करो , सब लोग आते ही होंगे " सुजाता ने दर्द छुपाते हुए कहा |
"सुजाता , सुना है तुम प्लेसमेंट नहीं ले रही हो, डिग्री के बाद क्या प्लान है ? क्या शादी वादी..." कहना कुछ था और कुछ और ही कह रहा था |
"अरे नहीं ! अभी तो कुछ बनना है , आगे पढ़ना है ... अमेरिका जाना है .... और तुम क्या बनने की सोच रहे हो ?
"कुछ कुछ.... तो बन ही जाऊंगा .." मायूसी छुपाने की कोशिश करते तन्मय ने कहा |



"हाँ तन्मय , तुम वाकई कुछ बन गए हो " कॉफी पीने जाते हुए सुजाता ने कहा |
"तुम ने भी तो बहुत नाम कर लिया है बहुत अच्छा लगा सुनकर , वैसे मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था , इसीलिए कॉफी पीने को तुम्हें कहा था , वरना और कोई बात नहीं है " तन्मय दोबारा सफाई दे रहा था |
"मैंने तुमसे पूछा है क्या ? तुम भी ....." मुंह बिचकाते हुए सुजाता बोली |
"क्या पिओगी?" कैफे में तन्मय ने पूछा |
"नहीं मैं अभी खाना खा कर आई हूँ , तुम पियो , मैं तो सिर्फ़ वाक करने के लिए आई थी | तुम ले लो ..फिर गप्पे मारेंगे..." कहते हुए वो काउंटर से दूसरी और चली गई |

सुजाता ने अभी अभी नई नौकरी शुरू की थी | पहले ही मीटिंग में एक पहचाने चेहरे को देख सुजाता की बोलती बंद हो गई थी | यहाँ तक की जब उसके बोलने की बारी थी तब भी उसे कुछ सूझ नहीं रहा था | क्या टी.के. ही तन्मय था ???? इतनी बार ईमेल से बात चीत हुई होगी इस टी.के के साथ , और कभी भी इसने बताया नहीं की ये ही ...| इसे तो पता होगा ....शायद नहीं...... नहीं नहीं ज़रूर पता होगा .... और फिर भी नहीं बताया .... क्यों?

सामने तन्मय एक कॉफी के दो हिस्से कर रहा था |
" क्यों कॉफी ठंडा कर रहे हो ? मिस्टर टी के ! " व्यंग करते हुए सुजाता बोली |
"हा हाहा हाहा दरअसल , एक साल से तुम्हें पहचान गया था पर कभी बात करने की हिम्मत नहीं हो पाई | फिर मैंने सोचा पता नहीं तुम यहाँ ज्वाइन करोगी भी या नहीं ... करो तो तुम्हे पता चल ही जायेगा और जो नहीं करो तो फिर नहीं की सी बात ...अरे हाँ कॉफी ठंडा नहीं कर रहा हूँ , तुम्हारे लिए आधा अलग कर रहा हूँ | ये लो ... " कप थमाते हुए कुछ बूँदें छलक गयीं |
" ओह आय ऍम सो सॉरी , आई रियली ऍम " नैपकिन देते हुए तन्मय फिर से वही प्रतीत हो रहा था - वही दस साल पहले वाला तन्मय - भोला भाला - घबराया हुआ सा - साफ़ दिल में बहुत सारा प्यार लिए...पर तब भी कितनी बंदिशें थीं और अब भी हैं , सिर्फ़ नाम बदल गए हैं |

"तन्मय कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? और मैडम जॉब करती हैं ?" बात आगे बढाते हुए सुजाता ने पूछा |
"तुमसे एक बढ़कर है | तुम्हारे दो हैं और मेरे तीन हैं | मंजुला - माय वाइफ - काम नहीं करती है | अभी बच्चे छोटे हैं |" कॉफी पीते पीते तन्मय बोला |
"तुम्हें कैसे मालूम मेरे दो बच्चे हैं ? वैरी फनी !" सुजाता ज़रा घबरा गई |
" अरे डरो मत ! अक्तुअली मुझे हमारे डिपार्टमेन्ट के सब लड़कियों के बारे में बहुत कुछ पता है | मैं क्या..... मुझे लगता है , सब लड़कों को सब लड़कियों की हिस्ट्री और जिओग्राफी के बारे में बहुत कुछ पता होता है , और मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ , तो रूचि होना स्वाभाविक है " कहते कहते मुस्कुराने लगा|
सुजाता ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी |
"तुम बहुत बदल गए हो तन्मय, विश्वास नहीं होता की ये तुम कह रहे हो , सच विश्वास नहीं होता !" हँसी दबाते हुए सुजाता चहकी |
"पर तुम बिल्कुल वैसी ही हो सुजाता, बिल्कुल वैसी, जैसी थी..... हाँ ये बात तो मैं भी मानता हूँ की विश्वास मुझे भी नहीं होता .... कभी सोचा ही नहीं था की तुमसे कभी बात होगी .... इस तरह ... can't just believe it .... "बड़ी संजीदगी थी कहने में |
"अच्छा चलो अपनी फॅमिली फोटो दिखाओ मुझे .. और हाँ ये बताओ की क्या क्या शौक़ हैं जनाब के ? म्यूजिक , डांस , स्पोर्ट्स क्या ..."बात बदलने के लिए नई बात छेड़ी सुजाता ने |
"पैसा कमाना - अब बस एक ये ही शौक़ रह गया है | इंडिया से इसी के लिए यहाँ आया और अब भी यहीं पड़ा हूँ पर अभी तक ना ही फाइनेंस में और ना ही पोजीशन में कुछ कमाल कर पाया हूँ , बस यही दुःख रहता है |" मुट्ठी भींचते हुए वो उत्तेजित हो गया |
"अरे अरे , ऐसा मत कहो , भगवान् गुस्सा हो जायेंगे | इश्वर का दिया सब कुछ है तुम्हारे पास , अगर कदर नहीं करोगे तो फिर अच्छा नहीं होगा .....उसका शुक्रिया अदा करो और खुश रहो .... " मस्त होकर सुजाता बोली |
"तुम्हारी यही बात मुझे सीखनी है - लाइफ को फुल जीना | कैसे करती हो ? " तन्मय का एक बहुत ही टिपिकल स्टाइल है बात करने का , खासकर जब वो बातों में बहुत तल्लीन हो जाता था - अपने हाथों को चेहरे केसामने रख कर , आंखों को छोटा छोटा कर घूरने की दृष्टि से एक स्मित मुस्कान लिए, देखना |
"छोटी छोटी बातों में खुशी ढूँढो तन्मय ! बहुत हिम्मत, हौसला और सुकून पाओगे | वैसे भी किसे पता है कल का ; तो आज तो बिंदास होकर रहो ... अरे एक बात तुम्हें याद है , जब में इंटर कॉलेज कांटेस्ट में गई थी तो तुमने एकगुड लुक्क चार्म दिया था मुझे - गणेश जी का एक लोकेट - पता है उसी लोकेट को थाम कर मैंने कितने सार कांटेस्ट जीते थे | बात किसी चीज़ की नहीं होती तन्मय, उसमे बसे विश्वास की होती है |" सुजाता बड़े भावः से कह रही थी और तन्मय उसे सुनकर , उसे देख कर मुस्कुराये जा रहा था |
"सुजाता, शादी के पहले किसी से दोस्ती नहीं हुई तुम्हारी ?" कुछ सुनने के ख्याल से सवाल उठाया तन्मय ने |
"मेरे बहुत सारे दोस्त हैं तन्मय | हाँ अगर तुम ये पूछ रहे हो की कोई अफयेर तो नहीं हुआ तो सुनो -इन सब बातों में लूक्स बहुत मायने रखता है - and I was never pretty enough !"
"I was ..what ?" तन्मय का अजीब सा सवाल आया |
"अच्छा बाबा आय वास नहीं , आय ऍम नोट प्रेटी एनफ , अब खुश ...?" सुजाता ने हँसते हुए कहा |
"अरे, मैं .." तन्मय बात पूरी नहीं कर पाया |

बहुत देर बातें होती रहीं- कुछ नई , कुछ पुरानी , कुछ हँसी, कुछ यूँ ही , कुछ अनकही, कुछ अनसुनी .....
"चलो चलते हैं बहुत बातें हो गयीं " उठते हुए सुजाता ने कहा|

कैफे के बाहर बारिश का मौसम था | हलके अंधेरे में स्ट्रीट लाइट की हलकी रौशनी सी छाई थी | बहुत सर्दी थी |
"चलो वापस चलते हैं, तुमने जैकेट भी नहीं पहनी है " अचानक सुजाता ने ध्यान दिया |
"नहीं नहीं , मुझे सर्दी नहीं लग रही है , कुछ और देर वाक कर सकते हैं , अगर तुम्हारा कोई ज़रूरी काम हो " तन्मय बुदबुदाते हुए चल रहा था |
" अरे वाह ! देखो कितना सुंदर है ये सीन , आय मीन , पूरा मैरीन ड्राइव लग रहा है , है ?" सुजाता ने कहा |

वो शाम का नज़ारा , बारिश की बूँदें , हलोजन बल्ब की मध्हम रोशनी ,हरसू खामोशी , उस पल का एहसास , किसी का साथ और दिल में सुकून , क्या कोई दौलत ऐसी खुशी दे सकता है | पता नहीं ...शायद नहीं....
तन्मय ने बहुत ही धीरे से कहा -"पता है सुजाता मैं करीब दस साल से इसी रस्ते जाता हूँ पर कभी देखा नहीं था शायद कभी ध्यान गया ही नहीं | वाक़ई आज बहुत सुंदर लग रहा है |"

वक्त बीतता रहा | देखते देखते ट्रेल पूरा हो गया |
"दरअसल मुझे बहुत सर दर्द हो रहा था, तभी मैंने कॉफी के लिए कहा था , वरना मैं तुम्हें दीस्तर्ब नहीं करता " कहते कहते तन्मय लिफ्ट से बाहर कर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गया |
"ओफ्फो " सुजाता ने लिफ्ट का दरवाज़ा बंद किया |

सुजाता अब लिफ्ट में अकेली थी |
"तन्मय , तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और हरदम रहोगे , और ये तुम जानते भी हो ....
... पर अब वक्त बदल गया है , ज़िन्दगी बदल गई है तन्मय , अब मुझे एक औरत की तरह नहीं एक दोस्त की तरह देखो तन्मय वरना ..... पता नहीं .... " सुजाता लिफ्ट में खड़ी खड़ी अपने आप से बात कर रही थी | सोच सोच कर खिल खिला रही थी |
"सोचो तो , अगर मैं आज के इस किस्से को मोनिका को बताऊँ तो हॉस्टल मैं कितन हल्ला होगा - ओहो ! सुजाता कॉफी पीने गई थी , तन्मय के साथ , क्या क्या हुआ , बताओ , क्या बातें हुयीं ? और.. साथ चाय पीना , और वों भी आधी आधी , बाकी गर्ल्स कितना जलेंगी ... आमने सामने बैठ कर बातें करना , कितना धमाका होगा हॉस्टल में, और फिर हम दोनों का साथ साथ टहलना, कॉलेज में जैसे आग लग जायेगी...
shut up , सुजाता कॉलेज बीते अरसा गुज़र गया है | ये ज़िन्दगी है , कॉलेज नहीं ....
सुजाता ने अपने पॉकेट से कुछ निकाला और मुस्कुराने लगी | कुछ खास नहीं था , एक पुराना सा गुड लक् चार्म था गणेशजी का ....

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